गेहूं की अगेती खेती टॉप 5 किस्में – हाइलाइट्स
- DBW 303 की औसत पैदावार करीब 81.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, दानों में 12.1 फीसदी प्रोटीन
- WH 1270 अगेती किस्म है, अनुकूल हालात में 28 से 30 क्विंटल प्रति एकड़ पैदावार
- HD 3226 में 12.8 फीसदी प्रोटीन, पीले, भूरे और काले रतुआ के प्रति अच्छी प्रतिरोधक क्षमता
- DBW 187 करीब 120 दिन में पकती है, पूर्वी और उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए बताई गई
- समय पर बुवाई में करीब 40 किलो बीज प्रति एकड़ और कतारों में 22 से 25 सेंटीमीटर दूरी
Wheat Varieties: रबी सीजन में गेहूं की अच्छी पैदावार हासिल करने के लिए सही समय पर सही किस्म का चुनाव करना जरूरी है. गेहूं की पांच उन्नत किस्में DBW 303, WH 1270, DBW 327, HD 3226 और DBW 187 अपनी अलग-अलग खूबियों के कारण किसानों के लिए उपयोगी हो सकती हैं. इनमें कुछ किस्में अगेती बुवाई के लिए उपयुक्त हैं, जबकि कुछ में रोगों से लड़ने की क्षमता और बेहतर दाना गुणवत्ता जैसी विशेषताएं हैं.
धान की कटाई के बाद कई राज्यों में किसान गेहूं की बुवाई की तैयारी कर रहे हैं. बीज खरीदने से पहले किसानों को अपनी जमीन, सिंचाई की सुविधा और बुवाई के समय को ध्यान में रखना चाहिए. केवल अधिक पैदावार के दावे को देखकर किसी किस्म का चयन करना सही नहीं है.
गेहूँ की 5 किस्मों की ख़ासियत एक नज़र में
| किस्म | बुवाई / क्षेत्र | पैदावार | खास बात |
|---|---|---|---|
| DBW 303 (करण वैष्णवी) | अगेती, उत्तर-पश्चिमी सिंचित क्षेत्र | करीब 81.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (औसत) | 12.1 फीसदी प्रोटीन |
| WH 1270 | अगेती | 28 से 30 क्विंटल प्रति एकड़ | मोटे दाने |
| DBW 327 (करण शिवानी) | उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र, और मध्य क्षेत्र की सिंचित और अगेती बुवाई के लिए अनुशंसित | 30 क्विंटल प्रति एकड़ से अधिक (क्षमता) | मजबूत तना |
| HD 3226 (पूसा यशस्वी) | समय पर, उत्तर-पश्चिमी सिंचित क्षेत्र | करीब 57.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (औसत) | 12.8 फीसदी प्रोटीन |
| DBW 187 (करण वंदना) | समय पर, उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्र | 64.70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (औसत) | करीब 120 दिन में तैयार |
आइए जाने गेहूं की इन 5 किस्मों की खासियत
1. DBW 303 यानी करण वैष्णवी
DBW 303 को करण वैष्णवी के नाम से भी जाना जाता है. इसे भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल ने विकसित किया है. यह उत्तर-पश्चिमी भारत के सिंचित क्षेत्रों में अगेती बुवाई के लिए उपयुक्त बताई गई है.
इस किस्म की औसत पैदावार करीब 81.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई गई है. अनुकूल परिस्थितियों में इसकी संभावित पैदावार लगभग 39 क्विंटल प्रति एकड़ तक हो सकती है. इसके दानों में करीब 12.1 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है.
रोगों के लिहाज से भी इस किस्म में अच्छी क्षमता बताई गई है. यह पीले और भूरे रतुआ के प्रति प्रतिरोधक क्षमता रखती है. उत्तर-पश्चिमी भारत के सिंचित क्षेत्रों में अगेती बुवाई करने वाले किसान इसके बारे में जानकारी ले सकते हैं.
2. WH 1270 किस्म से कितना उत्पादन?
WH 1270 को हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय ने विकसित किया है. यह गेहूं की अगेती किस्म है और कम अवधि में अच्छी पैदावार देने के लिए जानी जाती है. इसके दाने मोटे होते हैं.
अनुकूल मौसम और फसल की उचित देखभाल मिलने पर WH 1270 से करीब 28 से 30 क्विंटल प्रति एकड़ तक उत्पादन मिल सकता है. हालांकि, किसान इस किस्म का बीज खरीदने से पहले अपने इलाके में इसकी उपयुक्तता जरूर जांच लें.
इसकी अनुशंसित बुवाई अवधि की जानकारी भी स्थानीय कृषि विभाग या कृषि विशेषज्ञ से लेना जरूरी है. हर क्षेत्र में एक जैसी किस्म का प्रदर्शन होना तय नहीं है.
3. DBW 327 यानी करण शिवानी
DBW 327 को करण शिवानी के नाम से जाना जाता है. इसकी प्रमुख विशेषता मजबूत तना है. गेहूं की फसल में तेज हवा और बारिश के दौरान पौधों के जमीन पर गिरने की समस्या हो सकती है. मजबूत तने वाली इस किस्म में फसल के बिछने का जोखिम कम हो सकता है. यह किस्म उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र और मध्य क्षेत्र की सिंचित और अगेती बुवाई के लिए अनुशंसित है.
इसकी पैदावार क्षमता 30 क्विंटल प्रति एकड़ से अधिक बताई गई है. हालांकि, वास्तविक उत्पादन कई बातों पर निर्भर करता है. मिट्टी की स्थिति, सिंचाई, मौसम और फसल का प्रबंधन इसमें अहम भूमिका निभाते हैं.
4. HD 3226 यानी पूसा यशस्वी
HD 3226 को पूसा यशस्वी के नाम से जाना जाता है. यह उत्तर-पश्चिमी भारत के सिंचित क्षेत्रों में समय पर बुवाई के लिए उपयुक्त किस्म है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के हवाले से इसकी औसत पैदावार करीब 57.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई गई है.
इस किस्म के दानों में लगभग 12.8 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है. रोग प्रतिरोधक क्षमता इसकी एक और खासियत है. यह पीले, भूरे और काले रतुआ सहित गेहूं के कई प्रमुख रोगों के प्रति अच्छी प्रतिरोधक क्षमता रखती है.
5. DBW 187 यानी करण वंदना
DBW 187 को करण वंदना के नाम से भी जाना जाता है. यह करीब 120 दिनों में पककर तैयार हो जाती है. पीले और भूरे रतुआ जैसे प्रमुख रोगों के प्रति इसमें प्रतिरोधक क्षमता बताई गई है.
यह किस्म पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, असम और पश्चिम बंगाल सहित उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्रों के लिए बताई गई है. इन क्षेत्रों में सिंचित परिस्थितियों और समय पर बुवाई के दौरान इसकी औसत पैदावार 64.70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई गई है.
इस किस्म का चयन करने से पहले किसान अपने क्षेत्र के लिए जारी कृषि सिफारिशों की जानकारी जरूर लें. इसकी क्षेत्रीय उपयुक्तता को नजरअंदाज करके बीज खरीदना उचित नहीं होगा.
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बुवाई से पहले बीज और खेत की तैयारी कैसे करें?
गेहूं की किस्म चुनने के साथ खेत की तैयारी और बीज की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना जरूरी है. स्वस्थ बीज का इस्तेमाल करें और बुवाई से पहले बीज उपचार कृषि विशेषज्ञ की सलाह तथा उत्पाद के लेबल पर दिए निर्देशों के अनुसार करें.
समय पर बुवाई के लिए करीब 40 किलो बीज प्रति एकड़ की मात्रा बताई गई है. कतारों के बीच 22 से 25 सेंटीमीटर की दूरी रखें. हालांकि, बीज की वास्तविक मात्रा किस्म और बुवाई की विधि के अनुसार बदल सकती है.
खाद का इस्तेमाल मिट्टी की जांच और फसल की जरूरत के आधार पर करना चाहिए. सिंचाई भी फसल की अवस्था, मिट्टी में मौजूद नमी और मौसम को ध्यान में रखकर करें.
किसान अपने क्षेत्र के लिए सही किस्म कैसे चुनें?
पांचों किस्मों की विशेषताएं अलग-अलग हैं. DBW 303 और WH 1270 अगेती बुवाई के लिहाज से विचार करने योग्य हैं. DBW 327 में मजबूत तना इसकी खासियत है. HD 3226 में प्रोटीन की मात्रा और रतुआ रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बताई गई है. DBW 187 की पकने की अवधि करीब 120 दिन है.
किसानों को अपने जिले की जलवायु, सिंचाई की उपलब्धता और बुवाई के समय के अनुसार बीज चुनना चाहिए. स्थानीय कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विश्वविद्यालय से किस्म की अनुशंसा की पुष्टि करना बेहतर रहेगा. किसी किस्म की बताई गई पैदावार को हर खेत में मिलने वाला निश्चित उत्पादन नहीं समझना चाहिए.
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(डिस्क्लेमर – खेती या पशुपालन से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले स्थानीय कृषि/पशु विशेषज्ञ से सलाह लें.)










