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बकरी पालन पर सरकार दे रही 60% तक अनुदान, ऐसे करें ऑनलाइन अप्लाई

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Bihar Bakri Palan Yojana Subsidy 2026: बकरी पालन (Goat Farming) शुरू करने वालों को बिहार सरकार द्वारा पशुपालन विभाग की योजना में कुल प्रोजेक्ट लागत का 50 फीसदी तक अनुदान मिल रहा है. यानी अगर आपका प्रोजेक्ट 2 लाख रुपये का है, तो उसमें से 1 लाख रुपये सरकार खुद उठा लेगी. अनुसूचित जाति और जनजाति के लाभार्थियों के लिए यही अनुदान 60 फीसदी तक दिया जाता है. यह योजना बिहार के तमाम जिलों में चल रही है.

बाकी बची रकम आप अपनी जेब से लगा सकते हैं या बैंक से लोन लेकर जुटा सकते हैं. आवेदन पूरी तरह ऑनलाइन है. मतलब किसी बिचौलिये के चक्कर काटने की जरूरत नहीं.

किसे मिलेगा, कितना पैसा मिलेगा

बातडिटेल
स्कीमGoat Farming Subsidy
किसे मिलेगाबेरोजगार युवा, छोटे किसान, इच्छुक पशुपालक
कितनी सब्सिडीकुल प्रोजेक्ट लागत का 50% तक
SC/ST को60% तक अनुदान
यूनिट का साइज20 बकरी + 1 बकरा, या 40 बकरी + 2 बकरे
उदाहरण₹2 लाख का प्रोजेक्ट → ₹1 लाख सरकार से
कैसे अप्लाईपशुपालन एवं मत्स्य संसाधन विभाग के पोर्टल पर ऑनलाइन
मंजूरी कौन देगाजिला पशुपालन अधिकारी, दस्तावेज जांच के बाद

योजना का मकसद क्या है?

पशुपालन विभाग की इस योजना का सीधा मकसद बेरोजगार युवाओं और छोटे किसानों को अपना काम शुरू करने के लिए आर्थिक सहारा देना है. खेती से अक्सर उतना मुनाफा नहीं निकल पाता, इसलिए किसान साथ में कोई दूसरा काम खोजते हैं. बकरी पालन इसी लिस्ट में सबसे ऊपर आता है.

दरअसल, सरकार ग्रामीण युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है. इसी वजह से पूरी लागत का बोझ अकेले किसान पर नहीं डाला जा रहा. आधा हिस्सा विभाग खुद उठा रहा है.

खास बात ये है कि यूनिट का साइज पहले से तय है. आप 20 बकरियों के साथ 1 बकरे की यूनिट लगा सकते हैं. या फिर 40 बकरियों के साथ 2 बकरे वाली बड़ी यूनिट. अनुदान इसी कुल खर्च के हिसाब से तय होता है.

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आवेदन कैसे करें, कौन-से कागज लगेंगे?

आवेदन करने के लिए राज्य के पशुपालन एवं मत्स्य संसाधन विभाग के आधिकारिक पोर्टल पर जाकर ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करना होगा. पूरी प्रोसेस पारदर्शी रखी गई है. फॉर्म भरने से पहले सारे कागज तैयार रख लें, वरना बीच में अटक जाएंगे.

आवेदन के वक्त ये दस्तावेज जरूरी हैं:

  • आधार कार्ड और पैन कार्ड
  • बैंक पासबुक
  • जाति प्रमाण पत्र और निवास प्रमाण पत्र
  • जमीन से जुड़े कागजात या लीज एग्रीमेंट
  • बकरी पालन ट्रेनिंग का सर्टिफिकेट (अगर लिया हो)

फॉर्म सबमिट होने के बाद जिला पशुपालन अधिकारी दस्तावेजों की जांच करते हैं. मंजूरी मिलते ही यूनिट लगाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. बता दें कि जमीन अपनी न हो तो लीज एग्रीमेंट से भी काम चल जाता है.

ट्रेनिंग सर्टिफिकेट क्यों जरूरी है?

अगर आपने कृषि विज्ञान केंद्र जैसे किसी सरकारी संस्थान से बकरी पालन की बुनियादी ट्रेनिंग ली है, तो उसका सर्टिफिकेट आवेदन के साथ जरूर लगाएं. यह ट्रेनिंग 3 से 5 दिन की होती है. वक्त बहुत कम लगता है.

इसकी वजह ये है कि ट्रेनिंग सर्टिफिकेट लगा होने से आवेदन के सेलेक्ट होने की संभावना सबसे ज्यादा बढ़ जाती है. यानी 3 दिन की मेहनत आपको लाख रुपये के अनुदान के करीब पहुंचा सकती है. आवेदन से पहले नजदीकी केंद्र में पता कर लें.

नस्ल गलत चुनी तो मुनाफा गया

बकरी पालन में असली कमाई तभी निकलती है जब नस्ल आपके इलाके के मौसम से मेल खाए. बिहार और आसपास के मैदानी इलाकों के लिए ब्लैक बंगाल नस्ल सबसे शानदार मानी जाती है. यह साल में दो बार दो से तीन बच्चे देती है. इसके मीट की मांग बाजार में सबसे ज्यादा रहती है.

वहीं बरबरी और सिरोही नस्लें भी अच्छा विकल्प हैं. ये दूध और वजन, दोनों लिहाज से बेहतर मुनाफा देती हैं. नस्ल चुनने से पहले अपने जिले के पशुपालन अधिकारी या कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लेना समझदारी है.

20 बकरियों से कितनी कमाई होगी?

एक बार 20 बकरियों की यूनिट पूरी तरह तैयार हो जाए, तो साल भर में बच्चों की बिक्री और दूध से 2 से 2.5 लाख रुपये की आमदनी आसानी से हो जाती है. यानी 2 लाख के प्रोजेक्ट में जब आपने खुद सिर्फ 1 लाख लगाया, तो पहले ही साल में वह रकम कई गुना होकर लौट सकती है.

खर्च के मोर्चे पर भी राहत है. बकरियां घर के आसपास की हरी पत्तियों, घास और चने के भूसे पर आराम से पल जाती हैं. महंगा फीड रोज खरीदने की मजबूरी नहीं रहती.

जोखिम कम क्यों माना जाता है?

मुर्गियों के मुकाबले बकरियों में बीमारियां बहुत कम लगती हैं. देखरेख का खर्च भी कम रहता है. इसी वजह से इस काम को कम जोखिम वाला बिजनेस माना जाता है.

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि बिल्कुल ध्यान न दें. नस्ल का चुनाव, साफ-सफाई और बाजार तक पहुंच, तीनों पर काम करना पड़ता है. जो लोग यूनिट शुरू करने की सोच रहे हैं, वे पहले अपने जिले के पशुपालन कार्यालय से मौजूदा आवेदन विंडो और यूनिट लागत की ताजा जानकारी जरूर ले लें, क्योंकि जिले के हिसाब से लक्ष्य और तारीखें अलग-अलग तय होती हैं.

जगत पाल पिछले 7 वर्षों से कृषि पत्रकारिता कर रहे हैं। वे मंडी भाव, सरकारी कृषि योजनाओं, फसल बीमा, किसान रजिस्ट्री और कृषि व्यापार से जुड़ी खबरों की रिपोर्टिंग करते हैं। 2019 में उन्होंने ई-मंडी रेट्स की शुरुआत की, जहाँ वे रोज़ाना देशभर की मंडियों के भाव और कृषि नीतियों का विश्लेषण प्रकाशित करते हैं। वे [गंधेली/हनुमानगढ़] से हैं और ग्रेजुएशन कर चुके हैं।

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