हाइलाइट्स
- चने की खेती बारानी में अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा, सिंचित में नवंबर का पहला पखवाड़ा सही समय.
- छोटे दाने में 50-60 किलो, बड़े दाने में 80-85 किलो बीज प्रति हेक्टेयर.
- राइजोबियम टीके से बीज उपचार करने पर करीब 10-15% अधिक उपज मिल सकती है.
- प्रति हेक्टेयर 20 किलो नाइट्रोजन और 50 किलो फॉस्फोरस बुआई के समय डालें.
Chana ki Kheti: उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी भारत के मैदानी इलाकों में बारानी खेतों के लिए चने की बुआई का सही समय अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा है. सिंचित खेतों में नवंबर का पहला पखवाड़ा ठीक रहता है. बीज को करीब 10 सेंटीमीटर गहराई में डालें और राइजोबियम टीके से उपचार करें, तो 10-15% ज्यादा उपज मिल सकती है.
बता दें कि चना दलहनी फसल है और इसकी पैदावार खेत की तैयारी, बीज दर, खाद और खरपतवार नियंत्रण पर टिकी है. खास बात ये है कि गहराई कम रखने से उकठा रोग का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए बुआई के तरीके पर ध्यान देना जरूरी है.
चने की खेती के लिए कैसी मिट्टी और खेत की तैयारी चाहिए?
चने के लिए ऐसी मिट्टी आदर्श मानी गई है, जिसमें पानी की निकासी अच्छी हो और पी-एच मान 6.5 से 7.5 के बीच रहे. बलुई दोमट से चिकनी दोमट मिट्टी दलहनी फसलों के लिए ठीक रहती है.
खेत की तैयारी आसान है. एक गहरी जुताई करें, फिर हैरो और पाटा चलाएं. इसके बाद खेत बुआई के लिए तैयार हो जाता है.
चने की बुआई कब और कैसे करें?
चने की बुआई के लिए बारानी खेतों में अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा सही माना गया है. जबकि सिंचित खेतों (नहरी) में नवंबर का पहला पखवाड़ा चुनें. बुआई पंक्तियों में करें और पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30-45 सेंटीमीटर रखें.
बीज जमीन में लगभग 10 सेंटीमीटर गहराई पर जाना चाहिए. गहराई कम हुई तो उकठा रोग ज्यादा लगता है. पछेती बुआई में पंक्ति की दूरी घटाकर 22.5 सेंटीमीटर कर दें.
| बात | ब्योरा |
|---|---|
| बारानी में बुआई | अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा |
| सिंचित में बुआई | नवंबर का पहला पखवाड़ा |
| छोटे दाने का बीज | 50-60 किलो प्रति हेक्टेयर |
| मध्यम/बड़े दाने का बीज | 80-85 किलो प्रति हेक्टेयर |
| पंक्ति की दूरी | 30-45 सेमी |
| पछेती बुआई में दूरी | 22.5 सेमी |
| बीज की गहराई | करीब 10 सेमी |
एक हेक्टेयर में कितना बीज लगेगा?
दाने के आकार से बीज दर बदलती है. छोटे दाने वाली किस्मों में 50-60 किलो प्रति हेक्टेयर बीज चाहिए. मध्यम और बड़े दाने वाली किस्मों में यह 80-85 किलो हो जाता है.
यानी बड़े दाने की किस्म में बीज की मात्रा करीब डेढ़ गुना तक लग सकती है. बीज खरीदते वक्त किस्म का दाना देखकर ही मात्रा तय करें.
कौन-सी किस्में लगाएं किसान?
भारत के अलग-अलग इलाकों और हालात के लिए अनुमोदित कई उन्नत किस्में हैं. इनमें अद्विका (एनसी 7), एल 558 (जीएलके 17301), पूसा जेजी 16 (बीजीएम 10221 डीटीआईएल) और कंचन (आईपीसीके 2009-145) प्रमुख हैं. इनके अलावा किसानों के बीच चने की कुछ अन्य किस्में JG 11, JG 6, JG 315, JG 63, JG 74, JG 130, JG 16, JG 412, JG 322, JG 226, और JAKI 9218 अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित हैं।
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अब सवाल ये है कि आपके इलाके के लिए चने की कौन-सी किस्म सही रहेगी. इसके लिए आप अपने नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि अधिकारी से पूछकर किस्म चुनें. क्योकि मिट्टी और जलवायु की स्थिति के अनुसार क़िस्म चुनना सही रहेगा.
आपने चने (Gram) की विभिन्न प्रसिद्ध किस्मों, उनके पकने की अवधि, विशेषताओं और औसतन पैदावार की एक विस्तृत सूची दी है।
चने की प्रसिद्ध किस्मों की सूची (Varieties )
चने की सफल खेती के लिए क्षेत्र, जलवायु और मिट्टी के अनुसार सही किस्म का चयन करना बेहद आवश्यक होता है. उपयुक्त उन्नत किस्मों का चुनाव करने से न केवल फसल को सूखा, कीटों और विभिन्न रोगों से बचाया जा सकता है, बल्कि प्रति एकड़ पैदावार में भी काफी वृद्धि की जा सकती है. यहां नीचे देशी चना और काबुली चना की विभिन्न किस्मों की विशेषताएं, पकने की अवधि और औसत पैदावार की जानकारी दी गई है.
| किस्म का नाम | प्रकार / अनुकूलता | पकने की अवधि (दिन) | औसतन पैदावार (क्विंटल / एकड़) | प्रमुख विशेषताएं एवं रोग प्रतिरोधकता |
| Gram 1137 | पहाड़ी क्षेत्र | – | 4.5 | वायरस प्रतिरोधी |
| PBG 7 | पूरे पंजाब हेतु | 159 | 8.0 | फली पर धब्बा रोग, सूखा और जड़ गलन रोग की रोधक; दाने दरमियाने |
| CSJ 515 | सिंचित इलाके | 135 | 7.0 | दाने छोटे व भूरे (100 बीज = 17 ग्राम); जड़ गलन रोधक, फली धब्बा सहनशील |
| BG 1053 | काबुली चना (सिंचित) | 155 | 8.0 | फूल जल्दी आते हैं; दाने सफेद और मोटे |
| L 550 | काबुली चना | 160 | 6.0 | दरमियानी फैलने वाली, जल्दी फूल देने वाली; दाने सफेद |
| L 551 | काबुली चना | 135 – 140 | 6.0 – 8.0 | सूखा (Wilt) रोग रोधक |
| GNG 1958 | सिंचित व सामान्य सिंचाई | 145 | 8.0 – 10.0 | बीज भूरे रंग के |
| GNG 1969 | सिंचित व सामान्य सिंचाई | 146 | 9.0 | बीज सफेद रंग के |
| GLK 28127 | सिंचित इलाके | 149 | 8.0 | बीज हल्के पीले-सफेद व बड़े आकार के (उल्लू जैसे दिखने वाले) |
| GPF 2 | सामान्य | 165 | 7.6 | पौधे लंबे व ऊपर बढ़ते हैं; फली धब्बा रोग रोधक |
| RSG-963 | सामान्य | 125 – 130 | 6.0 | फली धब्बा, जड़ गलन, BGM, तना-जड़ गलन, फली कीट व नीमाटोड रोधक |
| Anubhav (RSG 888) | बारानी (असिंचित) क्षेत्र | 130 – 135 | 9.0 | सूखा और जड़ गलन रोधक |
| Pusa Chamatkar | काबुली चना | 140 – 150 | 7.5 | – |
| PBG 5 | सामान्य (वर्ष 2003) | 165 | 6.8 | दाने मध्यम मोटे व गहरे भूरे; सूखा व जड़ बीमारियों के प्रति सहनशील |
| PDG 4 | सामान्य (वर्ष 2000) | 160 | 7.8 | उखेड़ा (Wilt), जड़ गलन और सूखा सहनशील |
| PDG 3 | सामान्य | 160 | 7.2 | – |
| L 552 | सामान्य (वर्ष 2011) | 157 | 7.3 | दाने मोटे (100 दाने = 33.6 ग्राम) |
| C 235 | दूसरे राज्य | 145 – 150 | 8.4 – 10.0 | तना गलन और झुलस रोग सहनशील; दाने दरमियाने व पीले-भूरे |
| G 24 | दूसरे राज्य (बारानी क्षेत्र) | 140 – 145 | 10.0 – 12.0 | दरमियानी फैलने वाली किस्म |
| G 130 | दूसरे राज्य | दरमियानी अवधि | 8.0 – 12.0 | दरमियाने अंतराल की किस्म |
| Pant G 114 | दूसरे राज्य | 150 | 12.0 – 14.0 | झुलस रोग रोधक |
| C 104 | काबुली चना (पंजाब व UP) | – | 6.0 – 8.0 | – |
| Pusa 209 | दूसरे राज्य | 140 – 165 | 10.0 – 12.0 | – |
चना बिजाई के दौरान खाद का उपयोग कैसे करें ?
खाद मिट्टी की जांच के आधार पर ही डालनी चाहिए. अच्छी फसल के लिए प्रति हेक्टेयर 20 किलो नाइट्रोजन और 50 किलो फॉस्फोरस बुआई के समय दें.
गंधक की कमी वाली मिट्टी में 20 किलो गंधक प्रति हेक्टेयर फायदेमंद है. जस्ते की कमी हो तो 25 किलो जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर डालें. वहीं बीज को राइजोबियम टीके से उपचारित करने पर 10-15% अधिक उपज मिल सकती है.
खरपतवार से कैसे बचाएं चने की फसल?
बुआई के 2-3 दिन के अंदर, अंकुरण से पहले, 2.5-3.0 लीटर पेण्डीमेथिलीन को 650 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़कें. इससे 4-6 सप्ताह तक खरपतवार नहीं निकलते.
चौड़ी पत्ती और घास, दोनों तरह के खरपतवार के लिए दूसरा विकल्प है. एलाक्लोर की 4 लीटर या फ्लूक्लोरोलिन (45 ई.सी.) की 2.22 लीटर मात्रा 700 लीटर पानी में मिलाएं. इसका छिड़काव बुआई के तुरंत बाद या अंकुरण से पहले करें.
रसायन का इस्तेमाल लेबल और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के हिसाब से करें. उसके लिए अपने कृषि अधिकारी से संपर्क करें.
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