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Pusa JG 16 Chana: काबुली चने की उन्नत किस्म पूसा जेजी 16, 110 दिन में तैयार फसल, जानिए पैदावार व खासियत

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हाइलाइट्स

  • ICAR-IARI ने काबुली चने की सूखा सहनशील किस्म पूसा जेजी 16 विकसित की है.
  • सूखे की हालत में उपज 2 टन प्रति हेक्टेयर से ज्यादा, मूल किस्म 1.3 टन.
  • टर्मिनल सूखे से मध्य क्षेत्र में कई बार 50-100 फीसदी उपज का नुकसान होता है.
  • फसल 110 दिन में पकती है और फ्यूजेरियम उकठा व स्टंट रोग के प्रति प्रतिरोधी है.

Pusa JG 16 Chana: भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR-IARI), नई दिल्ली ने साल 2022 में काबुली चने की सूखा सहनशील किस्म ‘पूसा जेजी 16’ विकसित की है. संस्थान के मुताबिक सूखे की हालत में इसकी उपज 2 टन प्रति हेक्टेयर से ज्यादा रह सकती है, जबकि मूल किस्म जेजी 16 की उपज 1.3 टन थी. फसल 110 दिन में पक जाती है.

यह किस्म मध्य क्षेत्र के सूखा-प्रवण इलाकों के लिए बनी है. वहां टर्मिनल सूखा बड़ी समस्या है और कई बार 50 से 100 फीसदी उपज नष्ट हो जाती है. यानी बीज का चुनाव यहां सीधे कमाई से जुड़ा सवाल है.

टर्मिनल सूखा चने का कितना नुकसान करता है?

टर्मिनल सूखा यानी फसल के आखिरी दौर में नमी की कमी. ICAR-IARI के मुताबिक मध्य क्षेत्र में यह सबसे बड़ी चुनौती है. कई बार इसकी वजह से उपज में 50 से 100 फीसदी तक का नुकसान हो जाता है.

100 फीसदी नुकसान का मतलब है कि किसान के हाथ कुछ नहीं आता. इसी जोखिम को घटाने के लिए यह किस्म तैयार की गई है. हालांकि संस्थान ने यह नहीं बताया कि इस किस्म से नुकसान कितना घटेगा.

पूसा जेजी 16 कैसे बनी?

इसे जीनोमिक-असिस्टेड ब्रीडिंग तकनीक से बनाया गया है. इस तकनीक में सूखा सहने वाले जीन को सटीक ढंग से एक दूसरी किस्म से निकालकर मूल किस्म जेजी 16 में डाला गया. जीन का स्रोत ICC 4958 है.

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राष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी जांच हुई. अखिल भारतीय समन्वित चना अनुसंधान कार्यक्रम के परीक्षण में इसकी सूखा सहनशीलता की पुष्टि हुई. खास बात ये है कि यह जांच किसी एक संस्थान तक सीमित नहीं रही.

उपज और खूबियां एक नजर में

संस्थान की टीम का नेतृत्व करने वाले प्रधान वैज्ञानिक डॉ. सी. भारद्वाज ने इसकी खूबियां गिनाईं. उनके मुताबिक यह किस्म सूखा सहने के साथ फ्यूजेरियम उकठा और स्टंट रोग के प्रति प्रतिरोधी भी है. फसल कम अवधि में यानी 110 दिन में पक जाती है.

बिंदुपूसा जेजी 16मूल किस्म जेजी 16
सूखे में उपज2 टन/हेक्टेयर से ज्यादा1.3 टन/हेक्टेयर
पकने का समय110 दिन–
फ्यूजेरियम उकठाप्रतिरोधी–

कम से कम 2 टन और 1.3 टन के हिसाब से फर्क 0.7 टन यानी 700 किलो प्रति हेक्टेयर का बनता है. यह करीब 54% ज्यादा है. असली फर्क इससे ज्यादा भी हो सकता है, क्योंकि संस्थान ने 2 टन से ऊपर की बात कही है.

किन राज्यों के किसानों को मिलेगा फायदा?

संस्थान के मुताबिक यह किस्म मध्य क्षेत्र के लिए है. इसमें मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड, छत्तीसगढ़, दक्षिणी राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात आते हैं. यानी यह पूरे देश के लिए नहीं है.

ICAR-IARI के निदेशक डॉ. ए.के. सिंह ने कहा- “यह किस्म देश के मध्य क्षेत्र के सूखा-प्रवण इलाकों के किसानों के लिए वरदान साबित होगी.” उन्होंने इसे बनाने वाले ब्रीडरों और सभी साझेदारों को बधाई भी दी.

इसे किसने बनाया?

यह कई संस्थानों की साझा मेहनत है. ICAR-IARI के साथ जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय (जबलपुर), राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय (ग्वालियर) और ICRISAT (हैदराबाद) शामिल रहे.

टीम में डॉ. सी. भारद्वाज के साथ ICRISAT के डॉ. राजीव वार्ष्णेय और डॉ. मनीष रूरकीवाल, JNKVV की डॉ. अनीता बब्बर और RVSKVV की डॉ. इंदु स्वरूप रहीं. अब सवाल ये है कि किसानों तक बीज कब पहुंचेगा.

बीज की उपलब्धता, कीमत, बुवाई का समय और बीज दर की जानकारी के लिए किसान अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या राज्य कृषि विभाग से संपर्क करें.

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जगत पाल पिछले 7 वर्षों से कृषि पत्रकारिता कर रहे हैं। वे मंडी भाव, सरकारी कृषि योजनाओं, फसल बीमा, किसान रजिस्ट्री और कृषि व्यापार से जुड़ी खबरों की रिपोर्टिंग करते हैं। 2019 में उन्होंने ई-मंडी रेट्स की शुरुआत की, जहाँ वे रोज़ाना देशभर की मंडियों के भाव और कृषि नीतियों का विश्लेषण प्रकाशित करते हैं। वे [गंधेली/हनुमानगढ़] से हैं और ग्रेजुएशन कर चुके हैं।

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