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सरसों की नई किस्में मंजूर, HAU की 3 वैरायटी में 40.5% तक तेल, 26-28 क्विंटल पैदावार

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हाइलाइट्स

  • हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की आरएच-1975, आरएच-1706 और आरएच-1424 किस्में बिजाई के लिए अनुमोदित हुईं.
  • आरएच-1424 में तेल 40.5% तक है, जबकि सामान्य किस्मों में 35-36% रहता है.
  • तीनों किस्मों की औसत पैदावार 26 से 28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई गई है.
  • इस बार करीब 3 लाख हेक्टेयर में बिजाई का अनुमान है, पर तापमान 32 डिग्री से ऊपर है.

Mustard New Varieties: कृषि विभाग ने हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (HAU), हिसार की आरएच-1975, आरएच-1706 और आरएच-1424 को बिजाई के लिए अनुमोदित किया है. दो साल के ट्रायल के बाद मिली इस मंजूरी से अनुमोदित किस्मों की संख्या 18 हो गई है. सरसों की इन तीन नई किस्मों में तेल की मात्रा 40.5% तक पहुंच गई है. सामान्य किस्मों में तेल अधिकतम 35-36% रहता है.

सरसों की इन नई किस्मों (Mustard Seed) की मंजूरी ऐसे वक्त आई है जब बिजाई का मौसम सिर पर है. अनुकूल समय 5 अक्टूबर से शुरू होता है, लेकिन इस बार बारिश कम रही है और पारा 32 से 35 डिग्री से ऊपर चल रहा है. यानी किसान के सामने किस्म चुनने के साथ बिजाई का समय तय करने की चुनौती भी है.

सरसों की इन तीनों नई किस्मों में क्या खास है?

सरसों की खेती : सरसों की ये तीनों किस्में 139 से 143 दिन में पक जाती हैं. RH-1975 को ज्यादा उत्पादन वाली किस्म बताया गया है, RH-1706 को बेहतर तेल गुणवत्ता वाली और RH-1424 को बारानी इलाकों की किस्म.

किस्मपकने का समयऔसत पैदावार (क्विंटल/हेक्टेयर)तेल की मात्राखासियत
आरएच-1975140-143 दिन26-28करीब 39.3%ज्यादा उत्पादन
आरएच-1706140 दिन2738%इरूसिक अम्ल 2% से कम
आरएच-1424139 दिन2640.5% तकबारानी फसल, मोटा दाना

इरूसिक अम्ल कम होने की वजह से आरएच-1706 के तेल को ज्यादा गुणवत्ता वाला माना गया है. वहीं तीनों किस्मों का दाना मोटा है, जिसे व्यापारी ज्यादा खरीदता है. इसका सीधा मतलब है कि मंडी में खरीदार मिलने की गुंजाइश बेहतर रहती है.

दोगुनी पैदावार का दावा कितना ठोस है?

विभाग की ओर से कहा गया है कि इन किस्मों का उत्पादन प्रचलित किस्मों से दोगुना है. हालांकि प्रचलित किस्मों की औसत पैदावार का आंकड़ा सामने नहीं आया है. इसलिए दोगुने के दावे को परखना अभी मुश्किल है. तीनों की बताई गई औसत 26 से 28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

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तेल के आंकड़े ज्यादा साफ हैं. आरएच-1424 में 40.5% तेल है, जो सामान्य किस्मों के 35-36% से करीब 4.5 से 5.5 अंक ज्यादा बैठता है. बीज खरीदने से पहले कृषि विभाग से तुलनात्मक पैदावार जरूर पूछ लें.

सिंचित, बारानी और पछेती बिजाई में कौन सी किस्म?

संयुक्त निदेशक कृषि सतीश शर्मा और कृषि अनुसंधान अधिकारी जगजीत सिंह के अनुसार अलग-अलग हालात के लिए अलग किस्में अनुकूल हैं.

  • सिंचित क्षेत्र, अगेती बिजाई: आरएच-1975, आरएच-1706, आरएच-0749, आरजीएन-73, आरजीएन-13, आरएच-8812 (‘लक्ष्मी’), पूसा बोल्ड, वरुणा.
  • असिंचित क्षेत्र: आरएच-1424, आरजीएन-229, आरजीएन-48, आरएच-725, आरएच-761, आरजीएन-298.
  • पछेती बिजाई: आरजीएन-236, आरजीएन-145.
  • सेमग्रस्त इलाके: सीएस-58, सीएस-60, सीएस-62.

इस बार सरसों की बिजाई पर क्या खतरा है?

असल में दिक्कत तापमान की है. सरसों की बिजाई के दौरान औसत तापमान 27 से 28 डिग्री चाहिए, जबकि इन दिनों यह 32 डिग्री से ज्यादा है. यानी जरूरत से करीब 4 से 5 डिग्री ऊपर. विशेषज्ञों के मुताबिक ज्यादा गर्मी से अंकुरण प्रभावित होता है.

जड़ों का जमाव पूरा न हो तो पौधे की बढ़त भी रुकती है. बारिश और आईजीएनपी में पानी की कमी ने भी चिंता बढ़ाई है. जिले में 1.40 लाख हेक्टेयर रकबा बारानी है, जहां ज्यादातर सरसों ही बोई जाती है. इसलिए इस रकबे पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका है.

कितने हेक्टेयर में होगी बिजाई?

पिछले पांच साल का औसत देखें तो जिले में करीब 3.09 लाख हेक्टेयर में सरसों बोई जाती है. बीते साल यह आंकड़ा 2,72,516 हेक्टेयर रहा. इस बार करीब 3 लाख हेक्टेयर का अनुमान है, जो पिछले साल से लगभग 10% ज्यादा और औसत से लगभग 3% कम है. पानी की कमी के बीच किसानों का सरसों की ओर रुझान बढ़ने की संभावना जताई गई है.

पुराने ट्रेंड के हिसाब से आईजीएनपी क्षेत्र में 1.50 लाख, गंगनहर क्षेत्र में 1.15 लाख और भाखड़ा नहर क्षेत्र में 35 हजार हेक्टेयर में बिजाई होती है. सबसे बड़ा हिस्सा आईजीएनपी का है. वहीं पानी की कमी का सबसे ज्यादा असर भी वहीं बताया गया है.

हिसार की किस्में श्रीगंगानगर में क्यों चलती हैं?

अब सवाल ये है कि राजस्थान में तैयार किस्में पीछे क्यों रह जाती हैं. राजस्थान की ज्यादातर किस्में राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान (रारी), दुर्गापुरा, जयपुर में बनी हैं. दुर्गापुरा और श्रीगंगानगर के तापमान और जलवायु में काफी फर्क है. इसी वजह से रारी की किस्में श्रीगंगानगर में कामयाब नहीं हैं.

दूसरी तरफ हिसार और श्रीगंगानगर की मिट्टी, तापमान और जलवायु एक जैसी है. इसकी वजह ये है कि HAU की किस्में श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों में अच्छी पैदावार देती हैं.

बिजाई से पहले अपने ब्लॉक के कृषि कार्यालय से किस्म की जानकारी ले लें.

इसे भी पढ़े – सरसों की उन्नत किस्में, BPM (Q) 172 से 23 क्विंटल और राधिका से 17.88 क्विंटल की बंपर पैदावार

“सरसों की नई क़िस्मों” से संबंधित पूछे जाने वाले सवाल और उनके जवाब (FAQs):

सरसों की बिजाई कब करनी चाहिए?

सरसों की बिजाई के लिए अनुकूल समय 5 अक्टूबर से शुरू होता है. उस दौरान औसत तापमान 27 से 28 डिग्री सेल्सियस चाहिए. इन दिनों तापमान 32 डिग्री से ज्यादा है, जो अंकुरण के लिए ठीक नहीं. इसलिए तापमान घटने का इंतजार करना बेहतर रह सकता है.

सरसों की किस किस्म में सबसे ज्यादा तेल निकलता है?

ई मंजूर किस्मों में आरएच-1424 में सबसे ज्यादा, 40.5% तक तेल है. आरएच-1975 में करीब 39.3% और आरएच-1706 में 38% तेल बताया गया है. सामान्य किस्मों में तेल अधिकतम 35 से 36% रहता है.

बारानी इलाके के लिए सरसों की कौन सी किस्म सही है?

बारानी यानी असिंचित इलाके के लिए आरएच-1424 अनुकूल बताई गई है. यह 139 दिन में पकती है और औसत पैदावार 26 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. इसके अलावा आरजीएन-229, आरजीएन-48, आरएच-725, आरएच-761 और आरजीएन-298 भी असिंचित क्षेत्र के लिए सुझाई गई हैं.

सरसों की नई किस्मों की पैदावार कितनी है?

तीनों नई किस्मों की औसत पैदावार 26 से 28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. आरएच-1975 में 26-28, आरएच-1706 में 27 और आरएच-1424 में 26 क्विंटल बताई गई है. विभाग ने इसे प्रचलित किस्मों से दोगुना बताया है.

HAU की किस्में श्रीगंगानगर में क्यों अच्छा उत्पादन देती हैं?

हिसार और श्रीगंगानगर की मिट्टी, तापमान और जलवायु एक जैसी है, इसलिए HAU की किस्में वहां अच्छा उत्पादन देती हैं. यही किस्में हनुमानगढ़ जिले में भी कारगर हैं. वहीं जयपुर के दुर्गापुरा की जलवायु अलग होने से रारी की किस्में श्रीगंगानगर में कामयाब नहीं रहीं.

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जगत पाल पिछले 7 वर्षों से कृषि पत्रकारिता कर रहे हैं। वे मंडी भाव, सरकारी कृषि योजनाओं, फसल बीमा, किसान रजिस्ट्री और कृषि व्यापार से जुड़ी खबरों की रिपोर्टिंग करते हैं। 2019 में उन्होंने ई-मंडी रेट्स की शुरुआत की, जहाँ वे रोज़ाना देशभर की मंडियों के भाव और कृषि नीतियों का विश्लेषण प्रकाशित करते हैं। वे [गंधेली/हनुमानगढ़] से हैं और ग्रेजुएशन कर चुके हैं।

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