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जैविक खीरे ने बदली किसान की किस्मत… 90 दिन में 40 टन उत्पादन, 15 लाख की आय

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स्टोरी हाइलाइट्स

  • 70 साल के सोनाराम यादव ने 3 साल पहले 4048 वर्ग मीटर में पॉलीहाउस लगाया
  • 90 दिन में करीब 40 टन जैविक खीरे का उत्पादन, लागत सिर्फ 1.20 लाख रुपये
  • साल में दो फसल लेकर अकेले खीरे से 20 से 30 लाख रुपये की कमाई
  • खारे भूजल से बचने के लिए बनाए 3 फार्म पौंड, ड्रिप से होती है सिंचाई

Organic Cucumber Farming: जयपुर जिले के किशनगढ़ रेनवाल के किसान सोनाराम यादव 70 साल की उम्र में वो कर दिखा रहे हैं, जो कई युवा किसान सोच भी नहीं पाते. उन्होंने अपने 10 बीघा खेत में से करीब 4048 वर्ग मीटर हिस्से में तीन साल पहले पॉलीहाउस लगाया और उसमें खीरे की पूरी तरह जैविक, संरक्षित खेती शुरू कर दी. नतीजा – महज 90 दिन में करीब 40 टन खीरा और एक फसल पर 15 लाख रुपये तक की आय.

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उनकी एक फसल की कुल लागत करीब 1.20 लाख रुपये बैठती है. यानी लागत सवा लाख के आसपास और शुद्ध कमाई साढ़े तेरह लाख से ऊपर. साल में दो बार फसल लेकर वे अकेले खीरे से ही 20 से 30 लाख रुपये कमा रहे हैं.

लागत सवा लाख, कमाई 13.5 लाख

असल में यही आँकड़ा इस पूरी खबर की जान है. 1.20 लाख रुपये की लागत पर 15 लाख रुपये तक की आय का मतलब है – लगाए गए हर एक रुपये पर करीब 12 रुपये का रिटर्न. परंपरागत खेती में ऐसा रिटर्न लगभग नामुमकिन है.

खास बात ये है कि यह मुनाफा किसी बड़े रकबे से नहीं आ रहा. सिर्फ 4048 वर्ग मीटर, यानी करीब एक एकड़ से भी कम जमीन. बाकी खेत में डेयरी और चारा है.

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बता दें कि पॉलीहाउस में तापमान और नमी नियंत्रित रहती है, इसलिए फसल का चक्र छोटा और उत्पादन ज्यादा होता है. यही वजह है कि 90 दिन में 40 टन का आँकड़ा छू पाना मुमकिन हुआ.

खेत का हिसाब एक नजर में

ब्योराआँकड़ा
कुल जमीन10 बीघा
पॉलीहाउस क्षेत्र4048 वर्ग मीटर
एक फसल की अवधि90 दिन
एक फसल का उत्पादनकरीब 40 टन
एक फसल की लागत1.20 लाख रुपये
एक फसल से आय15 लाख रुपये तक
सालाना कमाई (2 फसल)20 से 30 लाख रुपये

यूरिया तक नहीं छूते, फिर फसल कैसे बचती है?

अब सवाल ये है कि बिना रासायनिक खाद और कीटनाशक के फसल कीड़ों से कैसे बचती है. इसका जवाब उनके खुद के तैयार किए घोल में है. सोनाराम 15 तरह के कृषि जैविक जीवों का घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करते हैं.

उनके खेत में रासायनिक खाद, कीटनाशक और यूरिया – तीनों का इस्तेमाल शून्य है. 15 प्रकार के बायो-एजेंट्स और सूक्ष्म जीवाणु मिलकर पूरे खेत का जैविक चक्र संभाले हुए हैं.

मिट्टी की उर्वरता के लिए वे केंचुआ खाद, वर्मीकंपोस्ट और डीकंपोजर काम में लेते हैं. वहीं फफूंद और कीट प्रबंधन के लिए ट्राइकोडर्मा, ब्यूवेरिया बेसियाना, स्यूडोमोनास और माइक्रोराइजा जैसे जैविक उत्पाद इस्तेमाल होते हैं. दिलचस्प बात – इनके लिए उन्हें बाजार जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती.

खारा पानी था, तीन फार्म पौंड ने रास्ता निकाला

इस इलाके की सबसे बड़ी दिक्कत भूजल है. भू-गर्भ का पानी खारा है, जिसमें सामान्य सब्जी की फसल टिक ही नहीं पाती. सोनाराम ने इसका तोड़ जमीन के ऊपर खोजा.

उन्होंने सिंचाई के लिए तीन फार्म पौंड बनवाए. इनमें से दो पौंड के पानी से वर्षभर पॉलीहाउस में खेती चलती रहती है. हर पौंड का पानी करीब दो साल तक सुरक्षित रहता है.

इसी सुरक्षित पानी को पॉलीहाउस में ड्रिप सिंचाई प्रणाली से चलाया जाता है, जिससे एक-एक बूंद का इस्तेमाल हो पाता है. दरअसल खारे पानी वाले इलाकों के लिए यही मॉडल सबसे कारगर साबित हो रहा है.

डेयरी से खाद भी, दूध की अलग आमदनी भी

खेती के साथ-साथ उन्होंने जैविक चक्र को गति देने के लिए डेयरी फार्मिंग को जोड़ा. उनके पास राठी नस्ल की 10 देशी गायें और 5 भैंसें हैं.

इन्हीं के गोबर और गोमूत्र से खेत के लिए जैविक खाद तैयार होती है. यानी खाद का खर्च लगभग खत्म. वहीं दूध की बिक्री से सोनाराम को अलग से आमदनी भी हो रही है.

आम किसान इससे क्या सीख सकता है?

सबसे बड़ी सीख ये है कि रकबा बड़ा होना जरूरी नहीं, मॉडल सही होना जरूरी है. एक एकड़ से कम जमीन पर भी सालाना 20 से 30 लाख रुपये का कारोबार खड़ा हो सकता है.

दूसरी सीख इनपुट लागत की है. जो किसान हर सीजन में खाद-कीटनाशक पर हजारों रुपये खर्च करता है, वह गोबर, गोमूत्र और बायो-एजेंट्स के जरिये इस खर्च को भारी हद तक घटा सकता है.

तीसरी बात पानी की. जहां भूजल खारा है, वहां फार्म पौंड और ड्रिप का जोड़ खेती को दोबारा मुमकिन बना देता है.

कृषि वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन और अपने बरसों के अनुभव के तालमेल ने सोनाराम के खेत को एक मॉडल एग्री-बिजनेस हब में बदल दिया है.

इसे भी पढ़े – पॉलीहाउस पर सरकारी सब्सिडी

(खेती में निवेश या पॉलीहाउस लगाने से पहले कृषि विभाग या सर्टिफाइड सलाहकार से सलाह लें.)

नमस्ते! मैं जगत पाल ई-मंडी रेट्स का संस्थापक, बीते 7 साल से पत्रकारिता कर रहा हूं। मुझे खेती-किसानी, मंडी भाव की जानकारी में महारथ हासिल है । यह देश का पहला डिजिटल कृषि न्यूज़ प्लेटफॉर्म है, जो बीते 7 सालों से निरन्तर किसानों के हितों में कार्य कर रहा है। किसान साथियों ताजा खबरों के लिए आप हमारे साथ जुड़े रहिए। धन्यवाद

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