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धान के खेत में अजोला की खेती से बढ़ेगी मिट्टी की उर्वरा शक्ति, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटेगी

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हाइलाइट्स

  • अजोला के साथ धान की औसत उपज में होगा बंपर इजाफा
  • नाइट्रोजन का उपयोग 100 से घटकर 60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर, लागत में 13.8 फीसदी कमी
  • अजोला प्रति हेक्टेयर 30 से 40 किलोग्राम नाइट्रोजन उपलब्ध कराता है
  • हरी परत से खरपतवारनाशकों की ज़रूरत 60 फीसदी तक कम, मीथेन उत्सर्जन 25-30 फीसदी कम

Azolla cultivation: धान की खेती में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाने के लिए अजोला बेहद उपयोगी है. एक सर्वे के मुताबिक अजोला के साथ धान की औसत उपज 47.5 क्विंटल से बढ़कर 53.8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हुई, यानी 13.3 फीसदी का सुधार. जबकि नाइट्रोजन का उपयोग 100 से घटकर 60 किलोग्राम रहा और लाभ 24,000 से 31,200 रुपये प्रति हेक्टेयर पहुँचा.

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आई.एफ.टी.एम. यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) के स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज एवं इंजीनियरिंग से जुड़े एक्सपर्ट ने अजोला को नाइट्रोजन का सस्ता और अहम प्राकृतिक स्रोत बताया है. इस लेख में उत्पादन विधि, लाभ, चुनौतियाँ और नीति से जुड़े सुझाव भी दिए गए हैं.

अजोला क्या है, धान में क्यों?

अजोला (Azolla) एक जलीय फर्न है, जिसे अक्सर ‘हरा सोना’ भी कहा जाता है. यह एनाबीना अजोला नाम की नीली-हरित शैवाल के साथ सहजीवी संबंध बनाकर जीता है. यह शैवाल हवा की नाइट्रोजन को स्थिर करती है, यानी पौधे के काम आने लायक रूप में बदल देती है. धान के लिए इस तरह मिलने वाला नाइट्रोजन सस्ता और अहम स्रोत माना जाता है.

धान में सबसे अहम पोषक तत्व नाइट्रोजन है, जिसकी पूर्ति आमतौर पर यूरिया जैसे रासायनिक उर्वरकों से होती है. ये उर्वरक महंगे हैं और मिट्टी की गुणवत्ता व पर्यावरण पर भी बुरा असर डालते हैं. भारत में धान की खेती करीब 4.4 करोड़ हेक्टेयर (44 million) में होती है और लाखों किसानों की आजीविका इससे जुड़ी है. ऐसे में जलवायु परिवर्तन, उर्वरकों की ऊँची लागत और मिट्टी में जैविक पदार्थों की कमी ने किसानों को वैकल्पिक समाधानों की ओर मोड़ा है.

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अजोला की विशेषताएं

विशेषताविवरण
वैज्ञानिक नामअजोला पिन्नात
वर्गीकरणटेरिडोफाइटा-जलीय फर्न
वृद्धि दर2-5 दिनों में दोगुनी मात्रा
नाइट्रोजन स्थिरीकरण1.5-3.0 कि.ग्रा. नाइट्रोजन/100 वर्ग मीटर/सप्ताह
जल में फैलावखेत में 7-10 दिनों में पूरी सतह को ढंक लेता है
प्रमुख उपयोगहरी खाद, पशु चारा, खरपतवार एवं मच्छर नियंत्रण
पर्यावरणीय लाभमीथेन उत्सर्जन में कमी, जल संरक्षण, मृदा उर्वराशक्ति में वृद्धि

उपज और मुनाफे में कितना फ़र्क?

धान में अजोला का इस्तेमाल करने पर उपज बढ़ी, जबकि नाइट्रोजन और कुल लागत घटी.

पैमाना (प्रति हेक्टेयर)पारंपरिक विधिअजोला के साथबदलाव
औसत उपज (क्विंटल)47.553.8+13.3 फीसदी
नाइट्रोजन उपयोग (किलोग्राम)10060-40 फीसदी
कुल उत्पादन लागत₹18,000₹15,500-13.8 फीसदी
लाभ₹24,000₹31,200+30 फीसदी

लागत 13.8 फीसदी घटी और लाभ 24,000 से बढ़कर 31,200 रुपये हो गया, यानी एक हेक्टेयर पर 7,200 रुपये ज़्यादा. नाइट्रोजन में 40 फीसदी की कटौती इस तुलना की सबसे बड़ी गिरावट है.

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नाइट्रोजन से खरपतवार तक अजोला के काम

अजोला धान के खेत में प्रति हेक्टेयर 30 से 40 किलोग्राम नाइट्रोजन उपलब्ध कराता है. फास्फोरस, पोटाश, कैल्शियम, जिंक और आयरन की भी आपूर्ति होती है. साथ ही जैविक कार्बन और पोषक तत्वों के संचय, मिट्टी की बनावट और उर्वरता में सुधार को भी अजोला की भूमिका में गिना है.

अजोला की हरी परत खेत की सतह को ढक लेती है, धूप नीचे नहीं पहुँचती और खरपतवारों का अंकुरण रुकता है. इससे रासायनिक खरपतवारनाशकों की ज़रूरत 60 फीसदी तक कम हो जाती है.

पर्यावरण की बात करें तो मीथेन उत्सर्जन में 25 से 30 फीसदी तक कमी आती है, मच्छरों के जीवनचक्र में रुकावट आती है और पानी की सतह ढकने से वाष्पीकरण घटता है.

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उगाने का तरीका और चुनौतियों के हल

अजोला की मात्रा 2 से 5 दिन में दोगुनी हो जाती है और 7 से 10 दिन में यह पूरी तरह उपयोग के लिए तैयार रहता है. इसके उत्पादन के लिए पानी का स्तर 5 से 10 सेंटीमीटर लगातार बनाए रखना होता है. पोषण के लिए प्रति वर्ग मीटर 10 ग्राम गोबर का घोल, 10 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट और 5 ग्राम चूने का इस्तेमाल करना चाहिए. इसका उत्पादन और संरक्षण टैंक, छोटे तालाब या प्लास्टिक कुंड में हो सकता है.

मुख्य चुनौतियाँ और समाधान

ज़्यादा बारिश में अजोला बह सकता है, इसलिए मेंढ़ ऊँची करने और जल निकासी की सही व्यवस्था करना जरूरी है. पक्षियों से बचाव के लिए खेत में जाली या नेटिंग लगाई जा सकती है. उच्च तापमान में सूखने से रोकने को आंशिक छायादार ढाँचा बनाने और जल स्तर नियंत्रित रखना चाहिए . शुरुआती इनोकुलम (अजोला का शुरुआती कल्चर) न मिलने की समस्या का हल गाँव स्तर पर उत्पादन इकाइयाँ बनाकर किया जा सकता है.

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जगत पाल पिछले 7 वर्षों से कृषि पत्रकारिता कर रहे हैं। वे मंडी भाव, सरकारी कृषि योजनाओं, फसल बीमा, किसान रजिस्ट्री और कृषि व्यापार से जुड़ी खबरों की रिपोर्टिंग करते हैं। 2019 में उन्होंने ई-मंडी रेट्स की शुरुआत की, जहाँ वे रोज़ाना देशभर की मंडियों के भाव और कृषि नीतियों का विश्लेषण प्रकाशित करते हैं। वे [गंधेली/हनुमानगढ़] से हैं और ग्रेजुएशन कर चुके हैं।

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