हाइलाइट्स
- अजोला पानी पर हरी परत जैसा जलीय फर्न है, जो करीब 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन परिवर्तित करता है.
- धान की रोपाई के एक हफ्ते बाद पानी भरे खेत में 4-5 क्विंटल ताजा अजोला छिड़का जाता है.
- पशु चारे के लिए टैंक में कल्चर डालने के 12 दिन बाद रोज एक किलो अजोला निकाला जा सकता है.
- अजोला के लिए pH 5.5 से 7, करीब 35 डिग्री तापमान और सीधी धूप जरूरी बताई गई है.
Azolla Farming Guide in Hindi: धान के खेत में अजोला उगाकर रासायनिक खाद की जरूरत घटाई जा सकती है. यह पानी की सतह पर हरी परत की तरह दिखने वाला जलीय फर्न है, जो वायुमंडल की नाइट्रोजन को बदलकर फसल के लिए लाभदायक बना देता है. अजोला को दुधारू पशुओं के चारे के लिए भी उगाया जाता है.
खेत में अजोला दो तरह से इस्तेमाल होता है. एक, रोपाई से पहले हरी खाद की तरह मिट्टी में मिलाकर. दूसरा, रोपाई के बाद पानी भरे खेत में छिड़ककर. पशुपालकों के लिए टैंक में उगाने का अलग तरीका है. साथ ही कुछ सावधानियां हैं, जिनका सीधा असर अजोला की बढ़वार पर पड़ता है.
अजोला क्या है और कैसे काम करता है?
अजोला एक जलीय फर्न है, जो पानी पर हरे रंग की परत जैसा दिखता है. भारत में मुख्य रूप से इसकी अजोला पिन्नाटा (Azolla pinnata R.Br.) किस्म मिलती है, जो काफी हद तक गर्मी सहन कर लेती है.
इस फर्न के निचले हिस्से में साइनोबैकेरिया (Cyanobacteria) बैटीरिया रहता है. जिसे ब्लू-ग्रीन अल्गी (नील-हरित शैवाल) भी कहा जाता है, जो वायुमंडल की नाइट्रोजन को परिवर्तित करता है. इसकी नाइट्रोजन को परिवर्तित करने की दर तक़रीबन 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बताई गई है. नाइट्रोजन मिट्टी की सेहत के लिए जरूरी तत्व है, जिसका फायदा धान की फसल और खेत की जमीन, दोनों को मिलता है.
अजोला हवा की कार्बन डाइऑक्साइड को कार्बोहाइड्रेट और नाइट्रोजन को अमोनिया में बदल सकता है. सड़ने के बाद यह फसल को नाइट्रोजन देता है और मिट्टी में जैविक कार्बन भी पहुँचाता है, जो मिट्टी की सेहत के लिए अच्छा माना जाता है.
अजोला की खेती से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी:-
| विषय | महत्वपूर्ण जानकारी |
|---|---|
| वैज्ञानिक नाम | Azolla pinnata R.Br. (भारत में सबसे आम प्रजाति)। अन्य प्रजातियाँ: Microphylla, Filiculoides, Caroliniana, Mexicana आदि। |
| कुल (Family) | Salviniaceae / Azollaceae |
| सामान्य नाम | अजोला, मच्छर फर्न (Mosquito Fern), डकवीड फर्न, फेयरी मॉस, जल फर्न |
| वर्गीकरण | Kingdom: Plantae Division: Pteridophyta Class: Polypodiopsida Order: Salviniales Genus: Azolla |
| प्रकृति एवं संरचना | मुक्त रूप से पानी की सतह पर तैरने वाला जलीय फर्न। आकार त्रिभुजाकार, लंबाई 1.5–3 सेमी, चौड़ाई 1–2 सेमी। पत्तियों की निचली गुहा में नील-हरित शैवाल Anabaena azollae के साथ सहजीवी संबंध। |
| मुख्य विशेषता | वायुमंडलीय नाइट्रोजन का जैविक स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation) करता है। अनुकूल परिस्थितियों में 3–7 दिनों में बायोमास दोगुना हो जाता है। |
| नाइट्रोजन स्थिरीकरण क्षमता | प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष लगभग 25–40 किग्रा (कुछ स्रोतों में 40–80 किग्रा तक) नाइट्रोजन। एक फसल में 20–40 किग्रा N/हेक्टेयर उपलब्ध कर सकता है। |
| पोषक तत्व संरचना (शुष्क भार पर) | प्रोटीन: 20–30% (कभी-कभी 25–35%) नाइट्रोजन: 4–5% फॉस्फोरस: 0.5–0.9% पोटैशियम: 2–4.5% कैल्शियम: 0.4–1.0% मैग्नीशियम: 0.5–0.65% फैट: 3–3.6% फाइबर: 9–15% साथ ही विटामिन A, B12, बीटा-कैरोटीन, आयरन, मैंगनीज आदि। |
| उपयुक्त तापमान | 20–30°C आदर्श। 15°C से कम या 35°C से अधिक पर वृद्धि रुक जाती है। |
| पानी की आवश्यकता | साफ, स्थिर पानी। गहराई 5–15 सेमी (आमतौर पर 5–10 सेमी)। पानी का pH 5.5–7.0 उपयुक्त। |
| खेती की विधि (घरेलू/छोटा स्तर) | 2×2 मीटर या 6×4 फीट का गड्ढा खोदकर प्लास्टिक/सिलपॉलिन शीट बिछाएँ। 10–15 किग्रा उपजाऊ मिट्टी + 2–3 किग्रा गोबर का घोल डालें। पानी भरकर 0.5–1 किग्रा ताजा अजोला कल्चर डालें। 10–15 दिनों में पूरा भर जाता है। |
| उर्वरक/पोषण | हर 5–7 दिनों में 20–30 ग्राम सुपर फॉस्फेट + 1 किग्रा गाय का गोबर का घोल मिलाएँ। फॉस्फोरस आवश्यक है। |
| उपज | छोटे तालाब से रोजाना 500–600 ग्राम से 1–2 किग्रा ताजा अजोला। वार्षिक रूप से 300 टन हरा बायोमास/हेक्टेयर तक संभव। |
| धान की खेती में उपयोग | हरी खाद के रूप में रोपाई से पहले या दोहरी फसल (dual cropping) के रूप में 500 किग्रा/हेक्टेयर डालें। खरपतवार नियंत्रण, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और रासायनिक नाइट्रोजन की आवश्यकता 20–30 किग्रा/हेक्टेयर कम करने में मददगार। |
| पशु आहार के रूप में | गाय-भैंस को 1.5–2 किग्रा/दिन → दूध उत्पादन में 10–20% वृद्धि। मुर्गी को 30–50 ग्राम/दिन → अंडा उत्पादन एवं वजन में सुधार। मछली, बकरी, बतख के लिए भी उत्तम। |
| अन्य लाभ | जैव उर्वरक, हरी खाद, खरपतवार एवं मच्छर नियंत्रण, जल शुद्धिकरण, मिट्टी की भौतिक-रासायनिक गुणों में सुधार, कार्बनिक कार्बन बढ़ाने में सहायक। |
| सीमाएँ | पानी सूखने पर मर जाता है। उच्च तापमान (>35°C) एवं छाया की कमी पर वृद्धि धीमी। कीट-रोग नियंत्रण की जरूरत पड़ सकती है। |
धान के खेत में अजोला डालने के दो तरीके
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार हरी खाद के रूप में पानी से भरे खेत में अजोला को 2 से 3 हफ्ते अकेले उगाया जाता है. फिर पानी निकाल दिया जाता है और रोपाई से पहले फर्न को खेत की मिट्टी में अच्छे से मिला दिया जाता है.
दूसरे तरीके में रोपाई के एक हफ्ते बाद पानी भरे खेत में 4-5 क्विंटल ताजा अजोला छिड़का जाता है. ऐसा करने से धान में रासायनिक खाद की जरूरत कम पड़ती है और उत्पादन ज्यादा होता है. अजोला से बनी हरी खाद का इस्तेमाल खरीफ और रबी, दोनों मौसम में किया जा सकता है.
कृषि विशेषज्ञों ने खाद के अलावा धान के खेत में अजोला के इस्तेमाल से होने वाले कुछ अन्य फायदे भी बताये हैं, जो की इस प्रकार से है:
- छोटे खरपतवार, जैसे चारा और निटेला, दब जाते हैं.
- सिंचित खेत से पानी का वाष्पीकरण कम होता है.
- रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल की क्षमता बढ़ती है.
- अजोला प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर और विटामिन छोड़ता है, जो धान के पौधों के विकास में मदद करते हैं.
- एक सीमा तक यह रासायनिक नाइट्रोजन उर्वरक (20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) का विकल्प बन सकता है.
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पशुओं के लिए टैंक में कैसे उगाएं अजोला?
पशु आहार के लिए अजोला उगाना हो तो सीमेंट के टैंक में या आप चाहे तो गड्ढा खोदकर प्लास्टिक/सिलपॉलिन शीट लगाकर 20 से 25 किलोग्राम खेत की साफ, छनी और भुरभुरी उपजाऊ मिट्टी डाली जाती है. फिर 20 लीटर पानी में 2 दिन पुराना 4 से 5 किलो गाय के गोबर का घोल अजोला के बेड पर डालें.
टैंक में 7 से 10 सेंटीमीटर पानी भरकर 1 से 1.5 किलोग्राम ‘मदर एजोला’ कल्चर डाल दें. अजोला की वृद्धि दर 2-5 दिनों में दोगुनी होती है. 12 दिन बाद रोज 1 किलो अजोला प्लास्टिक की छन्नी से निकाला जा सकता है. इसे साफ करके पशुओं को खिलाएं.
माना जाता है कि अजोला में सभी पोषक तत्व होते हैं और इसे खाने से दुधारू पशुओं में दूध उत्पादन बढ़ता है. पशुओं के अलावा मुर्गी और मछली पालन में भी इसका चारे के रूप में उपयोग हो सकता है. सूखा अजोला पोल्ट्री फीड के काम आता है, जबकि हरा अजोला मछलियों के लिए अच्छा आहार बताया गया है.
बढ़वार के लिए जरूरी सावधानियां
अजोला की खेती में pH 5.5 से 7 के बीच रहना चाहिए. अच्छी उपज के लिए संक्रमण से मुक्त माहौल जरूरी है. बढ़वार के लिए इसे नियमित रूप से काटते रहना चाहिए.
अच्छी बढ़वार के लिए करीब 35 डिग्री सेल्सियस तापमान चाहिए. ठंडे इलाकों में ठंड का असर कम करने के लिए चारे की क्यारी को प्लास्टिक की शीट से ढका जा सकता है. जगह ऐसी चुनें जहाँ सीधी और भरपूर धूप आती हो, क्योंकि छाया में पैदावार कम होती है.










