हाइलाइट्स
- माइक्रो फूड यूनिट को मशीनरी-सिविल वर्क पर 35% तक सब्सिडी मिलेगी.
- व्यक्तिगत लाभार्थी के लिए अधिकतम सब्सिडी सीमा ₹10 लाख तय है.
- लाभार्थी को कम से कम 10% लागत खुद वहन करनी होगी.
- ट्रेनिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग सहायता भी योजना का हिस्सा है.
PMFME Scheme: घर में बनने वाला अचार, पापड़, मसाला या नमकीन अब सिर्फ रसोई का काम नहीं रह गया, सरकार इसे बाकायदा बिजनेस बनाने में मदद कर रही है. प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम औपचारिकीकरण योजना यानी PMFME के तहत पात्र माइक्रो फूड प्रोसेसिंग यूनिट को मशीनरी और तकनीकी सिविल वर्क जैसी लागत पर 35% तक क्रेडिट-लिंक्ड कैपिटल सब्सिडी दी जा रही है. व्यक्तिगत यूनिट के लिए यह सब्सिडी अधिकतम ₹10 लाख तक सीमित है.
असल में यह स्कीम सीधे बैंक खाते में पैसा डालने वाली योजना नहीं है. यह क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी है, यानी पहले बैंक से लोन लेना होगा, उसके बाद ही सब्सिडी का हिसाब लगेगा. योजना के नियमों के मुताबिक लाभार्थी को प्रोजेक्ट लागत का कम से कम 10% हिस्सा खुद लगाना होगा, बाकी रकम बैंक लोन से आएगी.
कितने प्रोजेक्ट पर कितनी सब्सिडी मिलेगी?
यहां सबसे ज़्यादा कन्फ्यूज़न “35% तक” और “₹10 लाख तक” की दो शर्तों को लेकर होता है. दरअसल दोनों शर्तें साथ लागू होती हैं, यानी जो भी रकम कम बनेगी, सब्सिडी उतनी ही मिलेगी.
अगर पात्र प्रोजेक्ट लागत ₹10 लाख है तो 35% के हिसाब से सब्सिडी करीब ₹3.5 लाख बनेगी. वहीं ₹20 लाख की योग्य लागत पर यह आंकड़ा करीब ₹7 लाख तक पहुंच जाता है. लेकिन अगर लागत ₹30 लाख है तो 35% के हिसाब से ₹10.5 लाख बनता तो है, मगर व्यक्तिगत यूनिट के लिए तय ₹10 लाख की सीमा की वजह से सब्सिडी वहीं रुक जाएगी.
| प्रोजेक्ट की योग्य लागत | 35% के हिसाब से सब्सिडी | असल में मिलेगी सब्सिडी |
|---|---|---|
| ₹10 लाख | ₹3.5 लाख | ₹3.5 लाख |
| ₹20 लाख | ₹7 लाख | ₹7 लाख |
| ₹30 लाख | ₹10.5 लाख | ₹10 लाख (सीमा लागू) |
किसे मिलेगा योजना का फायदा?
यह योजना उन लोगों के लिए है जो छोटे स्तर पर खाद्य उत्पाद बनाते हैं. जैसे कोई अचार बनाता है, कोई पापड़ तैयार करता है, कोई मसाले पीसकर पैक करता है या कोई स्थानीय खाद्य उत्पाद को बड़े बाजार तक ले जाना चाहता है.
हालांकि सिर्फ घर में खाना बनाना काफी नहीं है, कारोबार को योजना की पात्रता शर्तें भी पूरी करनी होंगी. सरकारी जानकारी के मुताबिक यह योजना नए और मौजूदा, दोनों तरह के माइक्रो फूड प्रोसेसिंग उद्यमों को स्थापित करने या अपग्रेड करने में मदद करती है. यानी नया कारोबार शुरू करने वाले और पुराना कारोबार बढ़ाने वाले, दोनों आवेदन कर सकते हैं.
पैसे के अलावा और क्या मिलेगा?
खास बात ये है कि PMFME सिर्फ पैसे की मदद तक सीमित नहीं है. पात्र यूनिट को क्षमता निर्माण और ट्रेनिंग भी दी जाती है, जिसमें कारोबार चलाना, मार्केटिंग, बहीखाता, पंजीकरण, स्वच्छता मानक और खाद्य सुरक्षा जैसे विषय शामिल हैं.
उत्पाद के हिसाब से मशीनों के इस्तेमाल, पैकेजिंग, भंडारण और नए प्रोडक्ट बनाने की ट्रेनिंग भी दी जाती है. यानी सरकार का मकसद सिर्फ पैसा देना नहीं, बल्कि छोटे कारोबार को एक व्यवस्थित और औपचारिक बिजनेस में बदलना है.
ब्रांडिंग और मार्केटिंग में भी मिलेगी मदद
छोटे कारोबार की सबसे बड़ी दिक्कत यही होती है कि उत्पाद अच्छा होने के बावजूद उसकी सही ब्रांडिंग और मार्केटिंग नहीं हो पाती. इसकी वजह ये है कि इस काम के लिए न बजट होता है और न जानकारी.
PMFME में समूहों के लिए ब्रांडिंग और मार्केटिंग सहायता का प्रावधान रखा गया है. योजना में वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट यानी ODOP मॉडल पर भी जोर है, जिसका मकसद किसी जिले के प्रमुख खाद्य उत्पाद के आसपास खरीद, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग की पूरी चेन को मजबूत करना है.
किसे और कितना मिलेगा पैसा?
| सवाल | जवाब |
|---|---|
| किसे मिलेगा | नए और मौजूदा माइक्रो फूड प्रोसेसिंग यूनिट (अचार, पापड़, मसाला, नमकीन आदि) |
| कितना पैसा | योग्य लागत का 35% तक, अधिकतम ₹10 लाख (व्यक्तिगत यूनिट) |
| खुद कितना लगाना होगा | कम से कम 10% लागत |
| बाकी रकम | बैंक लोन के जरिए |
यह योजना आम आदमी के लिए कितनी कारगर?
अब सवाल ये है कि यह योजना आम आदमी के लिए कितनी काम की है. जो लोग घर से छोटा फूड बिजनेस चला रहे हैं, उनके लिए यह मशीन खरीदने, प्रोडक्शन बढ़ाने और कारोबार को कानूनी तौर पर व्यवस्थित करने का एक रास्ता बन सकता है. बिना बड़ी पूंजी के अकेले मशीन और सिविल वर्क में लाखों रुपये लगाना ज़्यादातर छोटे कारोबारियों के लिए मुश्किल होता है, ऐसे में सब्सिडी और ट्रेनिंग दोनों मिलना बड़ी राहत जैसा है.










