Radish Farming: मूली की खेती (Muli Ki Kheti) किसानों को सिर्फ़ 40 से 50 दिन में कमाई का मौका देती है. मैदानी इलाकों में बुवाई का समय सितंबर से जनवरी तक है, यानी अभी खेत तैयार करने का सही वक्त चल रहा है. एक हेक्टेयर में 10 से 12 किलो बीज लगता है, जबकि मूली का मंडी भाव 500 से 2500 रुपये प्रति क्विंटल तक रहता है.
दरअसल, मूली ठंडी जलवायु की फसल है, पर अब इसकी खेती पूरे साल होने लगी है. सलाद, सब्जी और अचार, तीनों में इस्तेमाल होती है. बड़े होटलों और ढाबों में सलाद के तौर पर चलने से बाजार में मांग बनी रहती है. यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है. यदि आप भी मूली की खेती करने की सोच रहे है, तो यह जानकारी आपको कम समय और कम लागत में बेहतर मुनाफा दे सकती है.
मूली की बुवाई कब करें?
मैदानी इलाकों में बुवाई का समय सितंबर से जनवरी तक माना जाता है. वहीं पहाड़ी क्षेत्रों में अगस्त तक बुवाई हो जाती है. यानी मैदान के किसानों के पास अभी कई महीनों की खिड़की खुली है. खेत जल्दी तैयार करना समझदारी है.
किस्म के हिसाब से भी समय बदलता है. पूसा हिमानी की बुवाई दिसंबर से फरवरी तक होती है, जबकि पूसा चेतकी को मार्च से मध्य अगस्त तक बोया जा सकता है. इसलिए बीज खरीदने से पहले अपने इलाके और महीने के हिसाब से किस्म चुन लें.
गर्मी बढ़ी तो कड़वी हो जाएगी जड़
मूली ठंडी जलवायु की फसल है और इसके लिए 10 से 15 डिग्री सेल्सियस तापमान सही रहता है. हालांकि आजकल इसे साल भर उगाया जाने लगा है. खास बात ये है कि ज्यादा तापमान फसल के लिए ठीक नहीं. इसकी वजह ये है कि गर्मी में जड़ें कड़ी और कड़वी हो जाती हैं.
मिट्टी की बात करें तो जीवांश वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है. मिट्टी का पीएच मान 6.5 के आसपास होना चाहिए. दरअसल, खेत की मिट्टी पहले जांच लें तो बाद में खाद पर फालतू खर्च से बचा जा सकता है.
खेत की तैयारी और खाद का हिसाब
बुवाई से पहले खेत को पांच से छह बार जोतना होता है. मूली की जड़ें जमीन में गहराई तक जाती हैं, इसलिए गहरी जुताई जरूरी है. इसके लिए ट्रैक्टर या मिट्टी पलटने वाले हल का इस्तेमाल करें. फिर कल्टीवेटर से दो बार जुताई करें और पाटा लगाकर खेत समतल कर दें.
खेत तैयार करते समय 200 से 250 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद डालें. इसके साथ प्रति हेक्टेयर 80 किलो नाइट्रोजन, 50 किलो फास्फोरस और 50 किलो पोटाश देना होता है. फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई से पहले जाती है.
नाइट्रोजन का बंटवारा थोड़ा अलग है. आधी मात्रा बुवाई से पहले दें. बाकी आधी दो बार में खड़ी फसल को मिलेगी, एक-चौथाई पौधों की शुरुआती बढ़वार पर और एक-चौथाई जड़ों की बढ़वार के समय. यानी 80 किलो में से 40 किलो पहले और 20-20 किलो बाद में.
कौन-सी किस्म बोएं?
उन्नत किस्मों से बेहतर और स्वस्थ उत्पादन मिलता है. प्रचलित नामों में जापानी सफेद, पूसा देशी, पूसा चेतकी, अर्का निशांत, जौनपुरी, बॉम्बे रेड, पूसा रेशमी, पंजाब अगेती, पंजाब सफेद, आईएचआर 1-1 और कल्याणपुर सफेद शामिल हैं. सूची लंबी है, पर सबके लिए एक ही किस्म फिट नहीं बैठती.
वहीं शीतोष्ण प्रदेशों के लिए रैपिड रेड, व्हाइट टिप्स, स्कार्लेट ग्लोब और पूसा हिमानी बेहतर बताई जाती हैं. इसलिए खरीद से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से पूछ लें कि आपके इलाके में कौन-सी किस्म चलती है.
बीज, दूरी और सिंचाई का तरीका
बीज को बोने से पहले उपचारित करना बेहद जरूरी है, ताकि रोगों से बचाव हो सके. एक हेक्टेयर के लिए 10 से 12 किलो बीज काफी है. प्रति किलो बीज पर 2.5 ग्राम थीरम लगाएं. चाहें तो 5 लीटर गौमूत्र प्रति किलो बीज के हिसाब से भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
बुवाई मेड़ों पर भी होती है और समतल क्यारियों में भी. पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 से 50 सेंटीमीटर रखें, मेड़ की ऊंचाई 20 से 25 सेंटीमीटर हो. पौधे से पौधे के बीच 5 से 8 सेंटीमीटर का फासला चाहिए. बीज 3 से 4 सेंटीमीटर गहराई पर डालें.
पहली सिंचाई तीन-चार पत्ती आने पर करें. सर्दियों में 10 से 15 दिन के अंतराल पर पानी काफी रहता है. गर्मियों में हर हफ्ते सिंचाई चाहिए. मिट्टी के हिसाब से यह कम-ज्यादा हो सकता है, यानी खेत की नमी देखकर फैसला लें.
रोग-कीट-खरपतवार से कैसे बचाएं?
खरपतवार की समस्या इस फसल में रहती है. इससे निपटने के लिए 2 से 3 बार निराई-गुड़ाई करें. जब जड़ों की बढ़वार शुरू हो, तब एक बार मेड़ों पर मिट्टी चढ़ाएं. बुवाई के 2 से 3 दिन के भीतर प्रति हेक्टेयर 3.3 लीटर पेंडामेथलीन को 600 से 800 लीटर पानी में घोलकर छिड़कना भी बताया गया है.
रोगों में व्हाइट रस्ट, सरकोस्पोरा कैरोटी, पीला रोग, अल्टरनेरिया पर्ण और अंगमारी प्रमुख हैं. इनके लिए डाईथेन एम 45 या जेड 78 का 0.2 फीसदी घोल, या 0.2 फीसदी ब्लाइटेक्स का छिड़काव बताया गया है. हालांकि छिड़काव से पहले मात्रा दोबारा जांच लें.
कीटों में माहू, मूंगी, बालदार कीड़ा, अर्धगोलाकार सूंडी, आरा मक्खी और डायमंड बैक कीट का प्रकोप ज्यादा रहता है. इनके लिए 0.05 फीसदी मैलाथियान और 0.05 फीसदी डाईक्लोरवास का इस्तेमाल बताया गया है. सबसे जरूरी बात, सभी दवाएं किसी अनुभवी व्यक्ति की देखरेख में ही डालें.
पैदावार और कमाई का गणित
फसल आमतौर पर 40 से 50 दिन में तैयार हो जाती है. मूली छोटी हो तो कटाई न करें. जब जड़ पूरी तरह खाने लायक आकार ले ले, तभी खुदाई शुरू करें. जल्दबाजी में नुकसान किसान का ही होता है.
पैदावार किस्म पर निर्भर करती है. यूरोपीय प्रजातियों से 80 से 100 क्विंटल और एशियाई प्रजातियों से 250 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन मिल सकता है. फर्क साफ है. एशियाई किस्में दो गुने से भी ज्यादा माल दे सकती हैं.
अब सवाल ये है कि जेब में कितना आएगा. मंडी भाव 500 से 2500 रुपये प्रति क्विंटल रहता है, और सामान्य उत्पादन 150 से 200 क्विंटल माना गया है. इस हिसाब से कमाई कुछ ऐसी बैठती है:
| उत्पादन (क्विंटल/हेक्टेयर) | भाव 500 रु./क्विंटल | भाव 2500 रु./क्विंटल |
|---|---|---|
| 150 | 75,000 रुपये | 3,75,000 रुपये |
| 200 | 1,00,000 रुपये | 5,00,000 रुपये |
बिक्री के लिए किसान क्षेत्रीय मंडी जा सकते हैं. शहर के नजदीक खुल रहे फल-सब्जी के रिटेल स्टोर भी एक रास्ता हैं, जहां से शहरों में सब्जी की सप्लाई होती है.
अब सवाल ये है कि इस सीजन में भाव कहां टिकेगा. यह अभी तय नहीं है, क्योंकि 500 से 2500 रुपये का फासला काफी बड़ा है. बुवाई से पहले अपनी स्थानीय मंडी का ताजा भाव, किस्म और बाजार तक की दूरी जरूर परख लें.
“मूली की खेती” से संबंधित पूछे जाने वाले सवाल और उनके जवाब (FAQ):
मूली की बुवाई कब करनी चाहिए?
मैदानी इलाकों में मूली की बुवाई सितंबर से जनवरी के बीच करनी चाहिए. पहाड़ी इलाकों में यह काम अगस्त तक निपट जाता है. पूसा हिमानी दिसंबर से फरवरी और पूसा चेतकी मार्च से मध्य अगस्त तक बोई जाती है. किस्म के हिसाब से महीना चुनें.
एक हेक्टेयर में मूली का कितना बीज लगता है?
एक हेक्टेयर खेत के लिए 10 से 12 किलोग्राम बीज काफी रहता है. बुवाई से पहले प्रति किलो बीज को 2.5 ग्राम थीरम से उपचारित करें. चाहें तो 5 लीटर गौमूत्र प्रति किलो बीज की दर से भी बीजोपचार हो सकता है.
मूली की फसल कितने दिन में तैयार होती है?
आमतौर पर मूली की फसल 40 से 50 दिन में तैयार हो जाती है. कटाई तब शुरू करें जब जड़ पूरी तरह खाने लायक आकार ले ले. छोटी अवस्था में मूली नहीं निकालनी चाहिए. इसके बाद मंडी या रिटेल स्टोर में बिक्री हो सकती है.
मूली की खेती में कितना मुनाफा होता है?
सामान्य भाव 500 से 1200 रुपये प्रति क्विंटल और 150 से 200 क्विंटल उत्पादन मानें तो कमाई 75,000 से 2.4 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर बैठती है. यह खर्च घटाने से पहले का आंकड़ा है. बीज, खाद और मजदूरी निकालने के बाद बचत कम होगी.
मूली में कौन-से रोग और कीट लगते हैं?
मूली में व्हाइट रस्ट, पीला रोग, अल्टरनेरिया पर्ण और अंगमारी जैसे रोग लगते हैं. कीटों में माहू, मूंगी, आरा मक्खी और सूंडी का प्रकोप ज्यादा रहता है. रोकथाम के लिए 0.2 फीसदी डाईथेन एम 45 और 0.05 फीसदी मैलाथियान बताए गए हैं.










