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मकचरी की खेती: पशुपालकों की चांदी, एक हेक्टेयर में 450 क्विंटल तक हरा चारा, जाने बुआई से कटाई तक पूरा तरीका

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हाइलाइट्स

  • सही तकनीक से मकचरी की खेती में एक हेक्टेयर पर 400-450 क्विंटल हरा चारा मिल सकता है.
  • बुआई के 60-70 दिन बाद पहली कटाई होती है, फिर हर 40-45 दिन पर.
  • चारे में करीब 8-12 फीसदी क्रूड प्रोटीन होता है, जो पशुओं के लिए पौष्टिक है.
  • सामान्य चारा मक्का के मुकाबले यह सूखा, जलभराव और फॉल आर्मीवर्म को बेहतर झेलती है.

Makchari ki Kheti: हरे चारे की किल्लत से जूझ रहे पशुपालकों के लिए मकचरी (Teosinte या वैज्ञानिक नाम Euchlaena mexicana) एक भरोसेमंद विकल्प बनकर उभर रही है. सही तकनीक अपनाई जाए तो इस बहुकटाई चारा फसल से एक हेक्टेयर में करीब 400-450 क्विंटल हरा चारा मिल सकता है. खास बात ये है कि सूखा, जलभराव और फॉल आर्मीवर्म का असर इस पर सामान्य चारा मक्का से कम पड़ता है.

पशु आहार की बढ़ती लागत, सिमटते चरागाह और अनिश्चित मौसम ने पशुपालन को पहले से मुश्किल बना दिया है. ऐसे में मकचरी को चारा फसलों का ‘हरित स्वर्ण’ कहा जाता है. वजह साफ है. यह कम समय में ढेर सारा हरा चारा देती है और कटाई के बाद तेजी से दोबारा उग आती है.

मकचरी आखिर है क्या?

मकचरी गर्म मौसम की बहुकटाई चारा फसल (Teosinte Fodder Crop) है. दिखने में यह मक्का जैसी लगती है, लेकिन इसमें खूब कल्ले निकलते हैं, पत्तियां घनी रहती हैं और कटाई के बाद पौधा जल्दी दोबारा बढ़ने लगता है. इसकी वजह ये है कि एक बार बुआई करके कई कटाई ली जा सकती हैं.

किन इलाकों में यह ठीक बैठेगी?

गर्म और नमी वाली जलवायु इसे सबसे ज्यादा रास आती है. यह ज्यादा आर्द्रता और कुछ समय के जलभराव को भी झेल लेती है. वहीं वर्षा आधारित और सीमित संसाधन वाले इलाकों के लिए इसे आदर्श चारा फसल माना गया है.

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पोषण के मामले में भी दमदार है मकचरी

चारे में क्रूड प्रोटीन करीब 8 से 12 फीसदी (शुष्क पदार्थ के आधार पर) और पर्याप्त रेशा होता है. कोमल और पत्तेदार होने की वजह से पशु इसे रुचि से खाते हैं. बताया गया है कि इससे पाचन और उत्पादन में सुधार होता है. आसान भाषा में, पेट भी भरता है और पोषण भी मिलता है.

पोषक तत्व (शुष्क पदार्थ के आधार पर)मात्रा (फीसदी)
क्रूड प्रोटीन8-12
न्यूट्रल डिटर्जेंट फाइबर55-65
एसिड डिटर्जेंट फाइबर30-40
एसिड डिटर्जेंट लिग्निन4-7
कुल खनिज पदार्थ8-12

पशुपालक के लिए इसका मतलब सीधा है. बाजार के महंगे आहार पर निर्भरता घटाने में खेत का अपना हरा चारा मदद कर सकता है. बशर्ते कटाई सही अवस्था में हो, तभी चारे की गुणवत्ता, स्वाद और पाचनशीलता बनी रहती है.

जल निकासी वाली दोमट मिट्टी सबसे मुफीद

सबसे अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट या दोमट मिट्टी रहती है. मिट्टी का पीएच 5.5 से 7.0 के बीच हो तो बात बन जाती है. हल्की अम्लीय जमीन में भी यह अच्छा बढ़ती है. यानी बहुत खास मिट्टी की जरूरत नहीं पड़ती.

खेत की तैयारी में एक गहरी जुताई करें. उसके बाद दो बार हैरो चलाकर पाटा लगा दें. इससे मिट्टी भुरभुरी और समतल हो जाती है, बीज का अंकुरण अच्छा होता है और पौधे ठीक से जम पाते हैं.

ग्रीष्म और खरीफ, दोनों में बो सकते हैं बीज

बुआई दो मौसम में हो सकती है. ग्रीष्मकालीन फसल मार्च से मध्य अप्रैल तक लगाई जाती है. खरीफ की बुआई मानसून शुरू होते ही जून-जुलाई में करना ठीक रहता है. समय पर बुआई से अंकुरण बेहतर होता है, पौधे तेजी से बढ़ते हैं और कल्ले ज्यादा निकलते हैं.

बीज दर 35-40 किलो प्रति हेक्टेयर रखें. बुआई सीडड्रिल से पंक्तियों में 25-30 सेंटीमीटर की दूरी पर करें और बाद में पाटा चला दें, ताकि बीज मिट्टी से अच्छी तरह चिपक जाए. रोगों से बचाव के लिए बीज को थीरम या एग्रोसान जीएन से उपचारित करें. मात्रा 3 ग्राम प्रति किलो बीज है.

Makchari ki Kheti

खाद, पानी और निराई का पूरा हिसाब

बुआई के समय 60 किलो नाइट्रोजन और 30 किलो फॉस्फोरस प्रति हेक्टेयर दें. बुआई के 25-30 दिन बाद 20-30 किलो नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग करें. पहली कटाई के तुरंत बाद 20 किलो नाइट्रोजन और डालें. इससे पुनर्वृद्धि बेहतर होती है.

मकचरी नमी की कमी को काफी हद तक सह लेती है. फिर भी लंबे सूखे में सिंचाई से चारा बढ़ता है. बारिश कम पड़े तो एक-दो सिंचाई लग सकती है, जबकि ग्रीष्मकालीन फसल में नियमित अंतराल पर पानी देना जरूरी है. खेत से पानी निकलने का इंतजाम भी रखें.

खरपतवार पर शुरुआत में ही काबू पाना जरूरी है. बुआई के 3-4 हफ्ते बाद एक गुड़ाई या हाथ से निराई करें. इससे मिट्टी में हवा का संचार भी बेहतर होता है. प्रकोप ज्यादा हो तो एट्राजीन की 0.75 किलो सक्रिय तत्व मात्रा को 600 लीटर पानी में घोलकर बुआई के 2-3 दिन के भीतर छिड़कें.

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पहली कटाई कब, फिर कब-कब?

पहली कटाई बुआई के 60-70 दिन बाद की जाती है. इसके बाद फसल की बढ़त और नमी देखकर हर 40-45 दिन पर कटाई ली जा सकती है. सही अवस्था पर कटाई करने से चारे की गुणवत्ता, स्वाद और पाचनशीलता बनी रहती है.

उन्नत तकनीक अपनाने पर करीब 400-450 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरा चारा मिल सकता है. बता दें कि यह आंकड़ा तभी हासिल होता है जब बुआई, पोषण, निराई और कटाई, चारों काम समय पर हों.

कीट-रोग का डर कम, पर सावधानी जरूरी

मकचरी सामान्यतः बड़े रोगों और कीटों से काफी हद तक बची रहती है. सामान्य चारा मक्का की तुलना में फॉल आर्मीवर्म के प्रति भी इसकी सहनशीलता बेहतर है. इसका सीधा फायदा किसान को मिलता है, क्योंकि फसल का नुकसान और रासायनिक कीटनाशकों की जरूरत दोनों कम हो जाते हैं.

फिर भी लापरवाही ठीक नहीं. स्वस्थ और उपचारित बीज इस्तेमाल करें, खेत साफ रखें और नियमित सफाई करते रहें. ये छोटी आदतें फसल को सेहतमंद रखती हैं और चारे की पैदावार बेहतर बनाती हैं.

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“मकचरी की खेती” से संबंधित पूछे जाने वाले सवाल और उनके जवाब (FAQs):

मकचरी की बुआई कब करनी चाहिए?

ग्रीष्मकालीन फसल की बुआई मार्च से मध्य अप्रैल के बीच और खरीफ की बुआई मानसून शुरू होने के तुरंत बाद जून-जुलाई में करनी चाहिए. समय पर बुआई से अंकुरण बेहतर होता है, पौधे तेजी से बढ़ते हैं और कल्ले ज्यादा निकलते हैं.

एक हेक्टेयर में मकचरी से कितना हरा चारा मिलता है?

उन्नत तकनीक अपनाने पर एक हेक्टेयर में करीब 400-450 क्विंटल हरा चारा मिल सकता है. इसके लिए समय पर बुआई, संतुलित खाद-पानी, खरपतवार नियंत्रण और सही अवस्था पर कटाई जरूरी है. पहली कटाई 60-70 दिन में होती है, उसके बाद हर 40-45 दिन पर.

मकचरी में कितनी खाद डालनी चाहिए?

बुआई के समय प्रति हेक्टेयर 60 किलो नाइट्रोजन और 30 किलो फॉस्फोरस दें. बुआई के 25-30 दिन बाद 20-30 किलो नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग करें. पहली कटाई के फौरन बाद 20 किलो नाइट्रोजन देने से पुनर्वृद्धि बेहतर होती है. यही संतुलित खुराक मानी गई है.

क्या मकचरी में फॉल आर्मीवर्म का खतरा रहता है?

सामान्य चारा मक्का की तुलना में मकचरी फॉल आर्मीवर्म के प्रति ज्यादा सहनशील है, इसलिए खतरा कम रहता है. इससे फसल का नुकसान और रासायनिक कीटनाशकों की जरूरत घटती है. फिर भी स्वस्थ और उपचारित बीज और खेत की नियमित सफाई जरूर अपनाएं.

मकचरी का चारा पशुओं के लिए कितना पौष्टिक है?

मकचरी का चारा पशुओं के लिए काफी पौष्टिक है, क्योंकि इसमें करीब 8-12 फीसदी क्रूड प्रोटीन और पर्याप्त रेशा होता है. कोमल, पत्तेदार होने से पशु इसे रुचि से खाते हैं. बताया गया है कि इससे पाचन और उत्पादन प्रदर्शन में भी सुधार होता है.

जगत पाल पिछले 7 वर्षों से कृषि पत्रकारिता कर रहे हैं। वे मंडी भाव, सरकारी कृषि योजनाओं, फसल बीमा, किसान रजिस्ट्री और कृषि व्यापार से जुड़ी खबरों की रिपोर्टिंग करते हैं। 2019 में उन्होंने ई-मंडी रेट्स की शुरुआत की, जहाँ वे रोज़ाना देशभर की मंडियों के भाव और कृषि नीतियों का विश्लेषण प्रकाशित करते हैं। वे [गंधेली/हनुमानगढ़] से हैं और ग्रेजुएशन कर चुके हैं।

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