हाइलाइट्स
- करनाल, कुरुक्षेत्र, अंबाला, कैथल, यमुनानगर और हिसार में मिट्टी की डिजिटल ग्रिड मैपिंग होगी.
- उपग्रह के आँकड़े और मिट्टी के नमूनों की जाँच मिलाकर डेटा बेस बनेगा.
- मृदा परीक्षण, फसल की किस्म और बुआई समय से उर्वरक की जरूरत आँकी जा सकेगी.
- बिना जरूरत यूरिया और डीएपी डालने की प्रवृत्ति घटाने में मदद की उम्मीद है.
- लागत में 15 से 25 फीसदी कमी के दावे हैं, पर नतीजे की गारंटी नहीं.
Digital Soil Mapping: हरियाणा प्रदेश के छह जिलों में खेतों की मिट्टी का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा. करनाल, कुरुक्षेत्र, अंबाला, कैथल, यमुनानगर और हिसार को डिजिटल ग्रिड मैपिंग की इस पहल में शामिल किया गया है. उपग्रह के आँकड़ों और मिट्टी के नमूनों की जाँच को जोड़कर खेतों की उर्वरता और पोषक तत्वों की स्थिति दर्ज करने का लक्ष्य है.
इस डेटा को AI आधारित तकनीक से जोड़ा जाएगा, ताकि किसानों को बताया जा सके कि किस खेत में किस पोषक तत्व की कितनी जरूरत है. ‘डिस्कवरी टू डिलीवरी’ मॉडल के तहत प्रयोगशाला में विकसित तकनीक को खेत तक पहुँचाने की यह पहल है. यह खेती की लागत घटाने और मिट्टी की सेहत सुधारने की दिशा में अहम कदम बन सकती है.
डिजिटल ग्रिड मैपिंग में क्या दर्ज होगा?
मिट्टी से जुड़ी जानकारियों को एक व्यवस्थित डिजिटल डेटा बेस में दर्ज करना इस पहल का लक्ष्य है. यहाँ उपग्रह से मिले आँकड़ों और खेतों से लिए गए नमूनों के विश्लेषण का तालमेल अहम होगा. इसके सहारे अलग-अलग इलाकों में मिट्टी की गुणवत्ता और पोषक तत्वों की उपलब्धता समझी जा सकती है.
ग्रिड मैपिंग यानी जमीन को खानों में बाँटकर हर हिस्से का रिकॉर्ड अलग रखना. जाँच इस तकनीक का एक हिस्सा भर है. असल मकसद ये समझना है कि जमीन में किस पोषक तत्व की कमी है.
खाद की जरूरत कैसे बताएगा एआई?
एआई (Artificial intelligence) आधारित टूल मृदा परीक्षण के नतीजों को फसल की किस्म, बुआई के समय और फसल के विकास की अवस्था से जोड़ सकते हैं. इस मेल से उर्वरकों की जरूरत का आकलन किया जा सकता है. इससे बिना जरूरत यूरिया और डीएपी डालने की प्रवृत्ति कम करने में मदद मिलेगी.
मौसम के आँकड़े भी इसी व्यवस्था से जुड़ सकते हैं. इनके आधार पर बिजाई, सिंचाई और कटाई की योजना बनाने में सहायता मिल सकती है.
लागत घटने और भूजल बचने की उम्मीद
खाद, कीटनाशक और पानी का इस्तेमाल जरूरत के हिसाब से होने पर किसानों की लागत घटने की संभावना है. संतुलित पोषण और सिंचाई से मिट्टी की सेहत बनी रह सकती है. भूजल पर पड़ने वाला दबाव भी इससे कम हो सकता है.
| पहलू | दावा |
|---|---|
| खेती की लागत | 15 से 25 प्रतिशत तक कमी |
| उपज | 10 से 20 प्रतिशत तक वृद्धि |
फिलहाल साफ़ नहीं है कि छह जिलों में मिट्टी का डिजिटल रिकॉर्ड कब तक तैयार होगा. यह भी सामने नहीं आया है कि एआई आधारित सलाह किसानों तक कैसे पहुंचाई जाएगी. पहल को कौन-सी एजेंसी चला रही है और किसानों को इसके लिए कोई शुल्क देना होगा या नहीं, इस पर भी जानकारी सामने नहीं आई है.
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