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वैश्विक खाद बाज़ार में उछाल, लेकिन 2026 में किसानों पर बड़ा खतरा, FAO ने जारी किया अलर्ट

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Global Fertilizer Market Report: यदि आपने हाल ही में दुकान से खाद खरीदी है, तो आपकी जेब पर पड़ा बोझ बता रहा है कि fertilizer market में कुछ तो बड़ा हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र का खाद्य और कृषि संगठन (FAO) अपनी नवंबर 2025 की रिपोर्ट में साफ कहता है: वैश्विक खाद बाज़ार में जबरदस्त उछाल आया है, लेकिन ये राहत क्षणिक हो सकती है। 2024-25 में दो साल की गिरावट के बाद fertilizer prices में 6% की बढ़त दर्ज हुई, जहाँ नाइट्रोजन का उपयोग इतिहास के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच गया। लेकिन एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं—अगर energy costs में अनियंत्रित वृद्धि हुई, तो 2026 में भारतीय किसान फिर से महंगाई की मार झेलेंगे।

क्या है? Fertilizer Market का ये बड़ा धमाका

चलिए, सबसे पहले समझते हैं कि FAO की रिपोर्ट आख़िर कह क्या रही है। वैश्विक स्तर पर खाद के उपयोग में 2024 में 20 करोड़ टन न्यूट्रिएंट्स तक पहुँच गया, जो 2020 के रिकॉर्ड स्तर के बेहद करीब है। इसमें सबसे ज़्यादा नाइट्रोजन (Nitrogen) का उपयोग 115 मिलियन टन तक पहुँचा—जो अब तक का ऐतिहासिक रिकॉर्स है । पोटाश (Potash) की मांग में भी तगड़ा उछाल देखा गया, खासकर ब्राज़ील, चीन, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों में।

लेकिन यहाँ ट्विस्ट है। phosphate fertilizers की मांग अभी भी सुस्त बनी हुई है, खासकर दक्षिण और पूर्व एशिया में। क्यों? क्योंकि फॉस्फेट की कीमतें अभी भी किसानों की पहुँच से बाहर हैं। दूसरी तरफ, agricultural subsidies ने भारत में स्थिति को कुछ संभाला—यूरिया पर सब्सिडी बढ़ाने और जीएसटी घटाने से किसानों को राहत मिली। चीन ने भी food security को ध्यान में रखते हुए अपने कृषि उत्पादन को बूस्ट देने के लिए खाद के उपयोग में बढ़ोतरी की।

क्यों जरूरी है? किसान से लेकर आपके खाने की थाली तक का सीधा कनेक्शन

अब आप सोच रहे होंगे—आख़िर मुझे क्यों परवाह करनी चाहिए? दरअसल, खाद की कीमतों में उतार-चढ़ाव सीधे तीन चीज़ों को प्रभावित करता है: किसान की आमदनी, global food prices, और आपके रसोई घर का बजट। जब खाद महँगा होता है, किसान फसलों की पैदावार घटा देता है या कम खाद डालता है, जिससे उत्पादन गिरता है। इसका असर बाज़ार में inflation impact के रूप में दिखता है और प्याज़ से लेकर दाल तक सब महँगा हो जाता है।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, भारत जैसे देश के लिए ये स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। हमारे देश में 55% से ज़्यादा कृषि योग्य भूमि खाद पर निर्भर है। यदि fertilizer market में अस्थिरता बनी रही, तो सरकार के agricultural subsidies का बोझ बढ़ेगा, जो आख़िरकार टैक्सपेयर की जेब से ही जाएगा। पंजाब और हरियाणा के किसान संघों का मानना है कि जब तक energy costs स्थिर नहीं होते, खाद के दामों में स्थिरता का सपना अधूरा रहेगा।

कैसे काम करेगा? कीमतों का ये Exponential गेम

अब बात करते हैं मैकेनिज़्म की। वैश्विक स्तर पर खाद उत्पादन बढ़ा है, लेकिन प्लांट्स का उपयोग अभी भी ऐतिहासिक चरम से नीचे है। मतलब ये कि क्षमता तो बढ़ रही है, लेकिन मांग उतनी तेज़ नहीं बढ़ रही। इससे supply chain में अतिरिक्त माल का जमाव हो रहा है। लेकिन फिर भी कीमतें बढ़ीं—कैसे?

इसके पीछे का रहस्य है energy costs का। नाइट्रोजन खाद बनाने के लिए natural gas बेहद ज़रूरी है। यूरोप में डच TTF गैस बेंचमार्क 2025 की शुरुआत में 58 यूरो/MWh तक उछला, फिर सितंबर में 32-33 यूरो/MWh पर आ गया। ऐसी अस्थिरता से उत्पादन लागत बढ़ती है, और कंपनियाँ कीमतें बढ़ा देती हैं। एक वरिष्ठ पत्रकार और कृषि अर्थशास्त्री डॉ. राजेश सिंघल बताते हैं, “जब LNG prices अस्थिर होते हैं, तो भारत जैसा आयातक देश सीधे प्रभावित होता है। हमारी लगभग 25% खाद आयात पर निर्भर है।”

भारत सरकार ने इसे संभालने के लिए agricultural subsidies को बढ़ाकर 1.75 लाख करोड़ रुपये किया, लेकिन ये स्थायी समाधान नहीं है। पॉलिसी एक्सपर्ट्स का कहना है कि fertilizer market को renewable energy से जोड़ना होगा ताकि गैस की कीमतों से मुक्ति मिल सके।

टाइमलाइन से समझिए पूरा खेल

ये कहानी 2020 से शुरू होती है, जब वैश्विक खाद उपयोग ने रिकॉर्ड तोड़ा था। फिर 2022 आया—geopolitical tensions और यूक्रेन युद्ध ने fertilizer prices को $815/टन तक पहुँचा दिया। किसानों की हालत खराब थी। 2023-24 में स्थिति सुधरी, कीमतें घटीं।

लेकिन 2024-25 ने फिर पलटी मारी। जनवरी 2025 से सितंबर तक नाइट्रोजन 23%, फॉस्फेट 21% और पोटाश 13% महँगा हो गया। सितंबर 2025 में खाद की औसत कीमत $489/टन थी, जो पिछले साल से 46% ज़्यादा। हालांकि, दिसंबर 2025 की दहलीज़ पर आते-आते नाइट्रोजन और फॉस्फेट की कीमतों में थोड़ी नरमी आई है।

अब FAO का अलर्ट है: अगर energy costs स्थिर नहीं हुए, तो 2026 की पहली छमाही में खाद के उपयोग में 3-5% की गिरावट आ सकती है। भारत में ये रबी सीज़न के लिए खतरे की घंटी है। सितंबर-अक्टूबर में खरीफ की बुआई हो चुकी है, लेकिन नवंबर से रबी की तैयारी शुरू होती है। यदि कीमतें नहीं घटीं, तो गेहूँ और सरसों की पैदावार प्रभावित होगी।

कहाँ से शुरू हुआ? Geography of restorations

इसकी जड़ें geopolitical tensions और energy crisis में हैं। यूरोप की गैस की निर्भरता रूस पर थी। युद्ध के बाद LNG prices में उछाल आया। चीन ने food security के लिए खाद में आत्मनिर्भरता बढ़ाई, जिससे वैश्विक supply chain प्रभावित हुआ। ब्राज़ील जैसे देशों में पोटाश की मांग बढ़ी क्योंकि commodity prices में सुधार हुआ।

भारत की बात करें तो हमारा 70% यूरिया घरेलू उत्पादन पर निर्भर है, लेकिन DAP और पोटाश का बड़ा हिस्सा आयात होता है—मुख्यतः मॉरिशस, सऊदी अरब और रूस से। जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में fertilizer prices उछलते हैं, तो भारतीय कंपनियाँ भी कीमतें बढ़ा देती हैं। सरकार को सब्सिडी बढ़ानी पड़ती है, जिससे fiscal deficit पर दबाव बढ़ता है।

एक दिलचस्प पहलू ये भी है कि गुजरात और ओडिशा में नए fertilizer manufacturing प्लांट्स तो खुल रहे हैं, लेकिन वे अभी पूरी क्षमता से नहीं चल रहे। कारण? Renewable energy से जुड़ने की ज़रूरत और पुराने प्लांट्स का आधुनिकीकरण। जब तक हम agriculture sector को एनर्जी इफिशिएंट नहीं बनाते, ये चक्र जारी रहेगा।

अगला कदम: क्या हो सकता है?

FAO का सुझाव है कि देश strategic reserves बनाएँ, renewable energy पर खाद उत्पादन शुरू करें और farmer cooperatives को मज़बूत बनाएँ। भारत के लिए सीधा मतलब है—उर फिलहाल, सरकार ने अगले बजट में खाद सब्सिडी में 15% की बढ़ोतरी का संकेत दिया है। लेकिन इसके साथ ही एक्सपर्ट्स direct cash transfer की वकालत कर रहे हैं ताकि सब्सिडी का असर सीधे किसान तक पहुँचे। अगले 3-6 महीने क्रिटिकल हैं। यदि global food prices स्थिर रहे और energy markets में उछाल न आए, तो भारतीय किसानों को राहत मिल सकेगी। वरना, अगले साल आपकी थाली में महँगाई का तड़का फिर से होगा।

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नमस्ते! मैं जगत पाल ई-मंडी रेट्स का संस्थापक, बीते 7 साल से पत्रकारिता कर रहा हूं। मुझे खेती-किसानी, मंडी भाव की जानकारी में महारथ हासिल है । यह देश का पहला डिजिटल कृषि न्यूज़ प्लेटफॉर्म है, जो बीते 7 सालों से निरन्तर किसानों के हितों में कार्य कर रहा है। किसान साथियों ताजा खबरों के लिए आप हमारे साथ जुड़े रहिए। धन्यवाद

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