राजस्थान में खरीफ बुवाई 3% घटी, किसानों के लिए क्या मायने
Rajasthan Kharif Sowing Report 2026: अगर आप राजस्थान के किसान हैं, या फिर खेती-किसानी की खबरों पर नजर रखते हैं, तो यह आंकड़ा आपको चौंका सकता है। राज्य में इस बार खरीफ फसलों की बुवाई पिछले साल की तुलना में कम हुई है। राज्य के कृषि विभाग की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक शुक्रवार तक 13.88 मिलियन हेक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी। पिछले साल इसी समय तक यह आंकड़ा 14.37 मिलियन हेक्टेयर था। यानी सीधा 3% से ज्यादा की गिरावट देखने को मिली है।
राज्य का सामान्य बुवाई क्षेत्र 16.41 मिलियन हेक्टेयर माना जाता है। अभी तक करीब 85% हिस्से में बुवाई पूरी हो चुकी है। बाकी बचे इलाकों में किसानों के पास अभी भी थोड़ा वक्त है, लेकिन मानसून की चाल पर सबकी निगाहें टिकी हैं।
किस फसल में बढ़ी बुवाई, किसमें आई गिरावट
| फसल | 2025 बुवाई (लाख हेक्टेयर) | 2026 बुवाई (लाख हेक्टेयर) | बदलाव (लाख हेक्टेयर) |
|---|---|---|---|
| मक्का | 8.88 | 9.56 | +0.67 |
| उड़द | 3.11 | 3.80 | +0.69 |
| तुअर | 0.02 | 0.04 | +0.02 |
| धान | 3.23 | 3.01 | -0.22 |
| बाजरा | 39.10 | 37.70 | -1.40 |
| मूंग | 22.60 | 22.00 | -0.60 |
| कुल दलहन | 34.90 | 34.40 | -0.50 |
| कुल तिलहन | 21.00 | 22.00 | +1.00 |
| मूंगफली | 9.59 | 10.80 | +1.21 |
| सोयाबीन | 9.70 | 9.22 | -0.48 |
| कपास | 6.28 | 5.34 | -0.94 |
| ग्वार | 21.80 | 17.00 | -4.80 |
| गन्ना | 0.04 | 0.05 | +0.01 |
मक्का और उड़द में तेजी
मक्का की बुवाई 8,88,477 हेक्टेयर से बढ़कर 9,55,718 हेक्टेयर हो गई। उड़द दाल का रकबा भी 3,11,345 हेक्टेयर से बढ़कर 3,80,112 हेक्टेयर पहुंच गया। तुअर की बुवाई तो पिछले साल के मुकाबले लगभग दोगुनी हो गई जो की 1,874 हेक्टेयर से बढ़कर 3,717 हेक्टेयर है।
धान, बाजरा और मूंग में कमी
धान का रकबा 3,22,702 हेक्टेयर से घटकर 3,01,037 हेक्टेयर रह गया। बाजरा भी 3.91 मिलियन हेक्टेयर से घटकर 3.77 मिलियन हेक्टेयर पर आ गया। मूंग की बुवाई की बात करें तो यह 2.26 मिलियन हेक्टेयर से थोड़ी घटकर 2.20 मिलियन हेक्टेयर रही। कुल मिलाकर दलहन फसलों का रकबा 3.49 मिलियन हेक्टेयर से घटकर 3.44 मिलियन हेक्टेयर पर पहुंच गया।
तिलहन में बढ़त, लेकिन सोयाबीन पिछड़ा
तिलहन फसलों का कुल रकबा 2.10 मिलियन हेक्टेयर से बढ़कर 2.20 मिलियन हेक्टेयर हो गया है। मूंगफली की बुवाई में खासा उछाल दिखा जो की इस बार 9,58,517 हेक्टेयर से बढ़कर 1.08 मिलियन हेक्टेयर में पहुंच गया है ।
लेकिन सोयाबीन के मामले में यह उलटा हुआ है। इसका रकबा 9,70,297 हेक्टेयर से घटकर 9,22,371 हेक्टेयर रह गया। बुआई के यह आकड़े बताते है कि इस बार किसानों ने मूंगफली को ज़्यादा अहमियत दी है ।
कपास और ग्वार की बुवाई में बड़ी गिरावट क्यों
कपास का रकबा इस साल 6,28,104 हेक्टेयर से घटकर सीधे 5,33,762 हेक्टेयर पर आ गया। वहीं ग्वार की स्थिति तो और भी गंभीर है, जी हाँ ग्वार की कम कीमतों के चलते इस बार किसानों का मोह भंग हुआ है और इसकी बुआई का आंकड़ा 2.18 मिलियन हेक्टेयर से घटकर सिर्फ 1.70 मिलियन हेक्टेयर रह गया है ।
वजह क्या रही, रिपोर्ट में इसका सीधा कारण नहीं बताया गया। अलबत्ता गन्ने की बुवाई में मामूली बढ़त जरूर दिखी जो की 3,773 हेक्टेयर से बढ़कर 4,850 हेक्टेयर पर पहुंच गई है । यह आंकड़ा भले छोटा हो, लेकिन राज्य में गन्ने की खेती के रकबे को देखते हुए इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मानसून की देरी का सीधा असर बुवाई पर
राजस्थान में मानसून की एंट्री इस बार सामान्य से देर से हुई। मौसम विभाग के मुताबिक सामान्य तौर पर मानसून 25 जून तक राज्य में दस्तक दे देता है, लेकिन इस बार 2 जुलाई को पहुंचा , यानी सात दिन की देरी से, जिसका सीधा असर खरीफ बुवाई क्षेत्रफल में देखने को मिला और यह बीते साल से 3 फ़ीसदी तक की गिरावट नज़र आई ।
1 जून से 3 अगस्त के बीच राज्य में 191.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई, जो सामान्य से 17% कम है। जुलाई के पहले हफ्ते में हुई अच्छी बारिश ने किसानों को समय पर बुवाई शुरू करने में जरूर मदद की। लेकिन पूरे सीजन का घाटा अभी तक पूरी तरह नहीं भर पाया।
किसानों पर इसका क्या असर पड़ सकता है
बारिश की कमी और देरी से पहुंचा मानसून, इन दोनों वजहों ने मिलकर कुल बुवाई क्षेत्र को पिछले साल से नीचे रखा है। खासकर कपास और ग्वार जैसी नकदी फसलों में गिरावट किसानों की आमदनी पर सीधा असर डाल सकती है।
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सीजन के आखिर तक स्थिति सुधरेगी या नहीं। अगस्त और सितंबर में होने वाली बारिश इस साल की पैदावार तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगी।
कृषि विभाग हर हफ्ते अपडेट करता है बुवाई के आंकड़े
कृषि विभाग बुवाई के आंकड़े हर हफ्ते अपडेट करता रहता है। जिन किसानों ने अभी तक बुवाई पूरी नहीं की, उनके लिए बचे हुए मानसून सीजन में बारिश की चाल अहम रहेगी। जो लोग इस डेटा से अपनी फसल की प्लानिंग जोड़ रहे हैं, उन्हें आने वाले हफ्तों में राज्य कृषि विभाग और मौसम विभाग की रिपोर्ट पर नजर बनाए रखनी चाहिए।












